करीब 44 साल पहले की बात है, जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मभूमि नगला चंद्रभान में उनकी संपत्ति बेसहारा पड़ी थी। उनकी यादों के नाम पर मात्र एक बड़ा सा उजड़ा चबूतरा और फूस की टूटी झोपड़ी ही बची थी।
उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवरस को अंत्योदय के उपासक की जन्मस्थली नगला चंद्रभान में उनके विचारों को चिरस्थायी बनाने की प्रेरणा जाग्रत हुई।
उन्होंने एकात्ममानववाद की धरा को दीनदयाल के विचारों से रंगने की जिज्ञासा के समाधान को उस दौर में संघ के क्षेत्र प्रचारक रहे भाउराव देवरस को बुलाकर नगला चंद्रभान में पंडितजी की यादों को साकार करने का दायित्व सौंपा। सरसंघचालक बाला साहब के निर्देश पर भाउराव ने मथुरा और आगरा के संघ और जनसंघ के कामों में हाथ बंटाने वाले चंद कार्यकर्ताओं के साथ फरह निवासी रामबाबू सिंघल और परखम के गिरिराज पाठक को इस मुहिम को साकार करने में जोड़ा।
1971 में जुटे चंद कार्यकर्ता एक झोपड़ी के आसपास सफाई में जुटे तो ग्रामीण कौतूहल से देखते रहे। धीमे-धीमे इसी झोपड़ी ने स्मारक का रूप ले लिया। गांव के बीच स्थापित यही स्मारक वर्तमान में दीनदयाल उपाध्याय से जुड़ी यादों को संग्रहीत किए हुए हैं।
मुगलसराय स्टेशन पर मिला था शव
दीनदयाल उपाध्याय का जन्म नगला चंद्रभान में 25 सितंबर 1916 को हुआ था। एक साल की उम्र में मां के साथ रेलवे स्टेशन मास्टर मामा के यहां अजमेर के पास धनतिया गांव में रहने गए। 11 साल की उम्र में होने पर उनके सात वर्षीय छोटे भाई का आकस्मिक निधन हो गया। 11 फरवरी 1968 को उनका शव मुगलसराय स्टेशन पर पड़ा मिला।
चाट-पकौड़ी की ढकेलों से हुई थी मेला की शुरुआत
उस समय पहली बार छोटे से गांव में संघ और जनसंघ के चंद कार्यकर्ताओं के प्रयास से यहां दीनदयाल की स्मृति में महोत्सव आयोजित हुआ। दीनदयालजी के एक वर्ष की उम्र में ही गांव से जाने के बाद ग्रामीण उनको भूल से गए थे। फिर उनके कभी गांव नहीं आने के कारण गांव के लोग उनके विचार और कद से वाकिफ नहीं रहे। ऐसे में उस समय महोत्सव के लिए कार्यकर्ताओं को खासा पसीना बहाना पड़ा।
1971 में जुटे चंद कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई। गांव के रमाशंकर बताते हैं, चाट-पकौड़ी की ढकेल और गुब्बारा बेचने वालों के अलावा छोटे-छोटे झूले वालों को अनुनय-विनय कर लाना शुरू किया। गांव के नेकराम पाठक और चंद अन्य लोग भी संघ कार्यकर्ताओं के प्रयास को सहयोग देने में जुट गए, तो पंडितजी का जन्मस्थान स्मारक के तौर पर साकार होने लगा।
अंत्योदय के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए नगला चंद्रभान में एक स्मारक बनाने को मात्र दो और पांच रुपये के कूपन संघ और जनसंघ कार्यकर्ताओं को बांटे गए। बूंद-बूंद से सागर भरता की कहावत को स्वयंसेवकों ने चरितार्थ करते हुए 1982 में भव्य स्मारक का सपना साकार कर दिया। फिर दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक शिष्य पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को स्मारक समिति का अध्यक्ष बनाकर विचारों को साकार करने की हवा चल पड़ी।
पं. दीनदयाल उपाध्याय स्मारक समिति के मंत्री डॉ. रोशनलाल बताते हैं कि भव्य स्मारक के विचार को साकार करने में स्वयंसेवकों ने दिनरात भागदौड़ की। उस समय मंत्री रहे प्रो. हीरालाल का इस प्रकल्प के निर्माण में अनुकरणीय योगदान है।
गांव निवासी पूर्व प्रधान जगदीश प्रसाद पाठक कहते हैं, स्मारक का सपना साकार होने के बाद क्षेत्र के शिक्षा में पिछड़े होने का ख्याल समिति के मन में उठा, तो गांव को केंद्र बिंदु मानकर सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना कर दी। गांव के एक और पूर्व प्रधान मक्खन लाल पाठक कहते हैं, क्षेत्र दीनदयाल जी की महत्ता से अनजान था। उनके विचारों को फहराने में अटलजी ने पूरा योगदान दिया।
एक बार उनके वर्तमान आवास के सामने सभा का आयोजन रखा तो अटलबिहारी बाजपेयी राजमाता विजयाराजे और तत्कालीन सर संघ चालक बाला साहब को गांव लाए और क्षेत्र को पंडितजी की अहमियत बताई। इसके बाद अंत्योदय के उत्थान के विचारों को लेकर शुरू हुआ एकात्ममानववाद का यह महोत्सव आज जन-जन के लिए संस्कारों को मेला बन चुका है।