अड़तीस रईसों के रुआब ने मशहूर गीतकार संतोष आनंद की आवाज को दबा दिया। उनके इकलौते बेटे संकल्प आनंद और बहू नंदिनी आनंद की मौत के लिए जिम्मेदार लोग आज भी जांच की आंच से बहुत दूर हैं। पुलिस इतने दबाव में रही कि 15 अक्तूबर, 2014 से लेकर आज तक अड़तीस आरोपियों में से केवल 12 के ही बयान दर्ज कर पाई है। न तो कहीं दबिश दी और न किसी को पूछताछ के लिए बुलाया। प्रदेश भर में चर्चित होने वाली इस घटना को पुलिस ने खामोशी के साथ दफन कर दिया है।
‘कोसी में गीतकार संतोष आनंद के बेटे-बहू ने ट्रेन से कटकर दी जान’ 16 अक्तूबर को ये खबर सुर्खियां बनी थी। दोनों ने आगरा-दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस के आगे कूदकर जान दे दी थी। पांच साल की बेटी रिंदिया बच गई थी। पुलिस ने मौके से एक सुइसाइड नोट भी बरामद किया था जिसमें संतोष आनंद के बेटे संकल्प आनंद ने करोड़ों के लेनदेन और विभागीय अफसरों के बढ़ते दबाव को अपने इस कदम के लिए जिम्मेदार ठहराया था। सुइसाइड नोट में 38 लोगों पर आरोप लगाया गया था।
संकल्प आनंद केंद्रीय गृह विभाग के इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फोरेंसिक साइंस में लेक्चरर थे। उन्होंने इंस्टीट्यूट में हुईं नियुक्तियों में धांधली की भी बात कही थी। इंस्टीट्यूट के तत्कालीन डायरेक्टर कमलेंद्र प्रसाद और डीआईजी संदीप मित्तल पर आरोप लगाए थे। यह भी कहा था कि यह लोग उस पर लगातार दबाव बनाते, प्रताड़ित करते थे। नियुक्तियों को लेकर 36 अन्य लोगों पर भी आरोप थे। मामले में पुलिस ने संतोष आनंद की तहरीर पर डीजी कमलेंद्र प्रसाद और आईजी संदीप मित्तल समेत 38 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई। इसमें आरोप था कि नामजद लोगों ने संकल्प आनंद को अपने परिवार के साथ आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया।
17 अक्तूबर, 2014 को मुकदमा दर्ज हुआ था। लेकिन तब से आज तक न तो इस मामले में किसी की गिरफ्तारी हुई और न दी दबिश गई। विवेचक ने अभी तक 38 में से केवल 12 लोगों के ही बयान दर्ज किए हैं। बताया जाता है कि जिन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई थी वह सभी दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा, हरियाणा और गाजियाबाद के असरदार लोग हैं। इनमें कुछ तो बड़े कारोबारी हैं।
अब तक बदल गए छह विवेचक
इस केस में अभी तक छह विवेचक बदल चुके हैं। किसी ने केस को चार महीने देखा तो किसी ने पांच महीने। अफसरों ने भी किसी से यह नहीं पूछा कि इतने दिन होने के बाद भी यह मामला लंबित क्यों है। जबकि इस बीच में छह पुलिस कप्तान बदल चुके हैं।
सत्ता के दबाव में ‘होल्ड’ पर रहा केस
प्यासा सावन, प्रेमरोग, क्रांति और रोटी कपड़ा और मकान... जैसी फिल्मों के लिए नगमे लिखने वाले संतोष आनंद की ओर से लिखाई गई रिपोर्ट को सत्ता के दबाव में होल्ड कर दिया गया। लखनऊ में बैठे अधिकारी बार-बार दोषियों को किसी भी स्थिति में नहीं बख्शने के दावे तो करते रहे लेकिन हकीकत में किसी ने कुछ नहीं किया। शासन ने भी कहा था कि अगर संकल्प आनंद के परिवार वाले चाहेंगे तो वह इस केस की जांच सीबीआई से भी करा सकते हैं। लेकिन केवल दावे ही होते रहे। पुलिस ने भी कुछ दिन बाद पूरे केस को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
ये हुए थे नामजद
कमलेंद्र प्रसाद, संदीप मित्तल, डा. बीएन चट्टेराज, एमके डागा, सिमी शंखधर, अमित शंखधर, रुही गांगुली, गौरीशंकर, एलबी सिंह, सुधीर, अजय ठाकुर, फारुख, हाफिज सिद्दीकी, प्रदीप शर्मा, मिस्टर श्रीवास्तव, शरद ओझा, देव कौशिक, सिद्धार्थ अग्रवाल, कामदार मुखई, डा. बत्रा, सपना गोयल, सुखविंदर, अरुण जैन, मिथलेश चौबे, जेपी यादव, पुष्पा यादव, बीएस चौहान, जौली, एके गर्ग, आलोक, सारंग, दीपा पांडेय, इम्तियाज खान, रविंद्र, इमरान, त्यागी, कैप्टन चौधरी और मथान।
250 करोड़ के लेनदेन का मामला गूंजा था
पुलिस को संकल्प आनंद की कार से जो सुइसाइड नोट मिला था उसमें उसने गुडगांव में एक कंपनी और कुछ भर्तियों को लेकर हुए 250 करोड़ के लेनदेन का हवाला दिया था। सुइसाइड नोट में कहा था कि कंपनी में उसका भी पैसा लगा था लेकिन लोगों ने उसके साथ धोखा किया।
मोटी धनराशि का मामला था तो साल 2015 में ईओडब्ल्यू को लिखकर भेजा गया, लेकिन आज तक जवाब नहीं आया। रही बात विवेचना में देरी की तो जल्द पूरी कर ली जाएगी।
-राजेश सोनकर, एसपी क्राइम