सूबे की सरकार ने 487 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आलू खरीदने की घोषणा की तो किसानों का दर्द जुबां पर आ गया। किसान बोले कि एक एकड़ में 75 हजार की लागत लग रही है जबकि सरकार के मूल्य से किसानों को मात्र 60 हजार रुपये ही मिल सकेंगे। ऐसे में घाटे की खेती पर सरकार ने भी अपनी मुहर लगा दी है।
आलू की बंपर पैदावार इस बार किसानों को रुला रही है। कोल्ड स्टोर हाउसफुल हैं और बाजार में आलू की कीमत जमीन पर आ गई हैं। ऐसे में सूबे की सरकार बनी और किसानों के हितों के दावे हुए तो आलू किसानों को भी आस बंधी।
मंगलवार को कैबिनेट बैठक में आलू खरीद के लिए सरकार नेसमर्थन मूल्य 487 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया लेकिन इस मूल्य को सुन किसानों के चेहरे पर मायूसी छा गई।
नगला तेजा के आलू किसान रामसनेही और सत्य प्रकाश सारस्वत ने बताया कि लागत के हिसाब से ये मूल्य नाकाफी है। एक एकड़ में बीज, बुवाई, जुताई, कीटनाशक, खोदाई, ट्रांसर्पोटेशन पर करीब 75 हजार की लागत आती है जबकि एक एक ड़ के उत्पादन 125 क्विंटल आलू की कीमत सरकारी समर्थन मूल्य से करीब 60 हजार ही बैठती है। ऐेसे सरकार का समर्थन मूल्य आलू किसानों के साथ मजाक है।
कारब के किसान सुरेश चौधरी और रामवीर सिंह ने कहा सरकार के समर्थन मूल्य के मायने होते हैं कि किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य मिल सके लेकिन आलू का घोषित मूल्य तो किसान की लागत से भी कम है। ऐसे में किसान को हर हाल में घाटा ही उठाना होगा।
ये है फैक्ट फाइल-
- मथुरा में करीब 25 हजार किसान करते है आलू की खेती।
- एक एकड़ में किसान की लागत करीब 75 हजार रुपये आती है।
- जबकि एक एकड़ में 125 क्ंिवटल आलू का उत्पादन होता है।
- सरकारी कीमत से इस आलू की कीमत बैठ रही है 60 हजार रुपया।
- किसान को एक एकड़ आलू पैदा करने पर 15 हजार का नुकसान हो रहा है।