राधाकुंड (मथुरा)। श्रीराधारानी की ननिहाल गांव मुखराई से शुरू हुआ चरकुला नृत्य अब ब्रज की होली का हिस्सा बन चुका है। ब्रज में जहां भी होली महोत्सव का आयोजन होता है, वहां चरकुला नृत्य का आयोजन देखने को मिलता है। चाहे श्रीकृष्ण जन्मभूमि की होली हो, बरसाना की लठामार होली। चरकुला नृत्य के बिना होली का कार्यक्रम अधूरा सा दिखाई देता है।
चरकुला नृत्य की कथा राधारानी के जन्म से जुड़ी है। इस अद्भुत परंपरा का सात समुद्र पार तक आकर्षण बना हुआ है। थाईलैंड, रूस, लंदन, इटली, इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि देशों में ब्रज के कलाकारों द्वारा चरकुला नृत्य का आयोजन किया जा चुका है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्र मास की शुक्ल पक्ष अष्टमी को पिता वृषभानु और माता कीरत का आंगन आदि शक्ति राधारानी की किलकारियों से गूंज उठा, जब यह बात नानी मुखरा देवी ने सुनी तो वह बहुत खुश र्हुइं। आंगन में रखे गाड़ी के पहिये पर 108 दीपक जलाकर पहिये को सिर पर रख कर नृत्य किया। इसी को चरकुला नृत्य कहा गया। होली के दूसरे दिन गांव मुखराई में ग्रामीण महिलाओं द्वारा 108 जलते दीपकों के साथ चरकुला नृत्य की परंपरा चली आ रही है।
छगन लाल, प्यारे लाल ने दिया चरकुला को नया रूप
सन् 1845 में गांव के प्यारे लाल, छगन लाल शर्मा ने चरकुला को नया रूप दिया। लकड़ी का घेरा लोहे के थाल, लोहे की पत्ती और मिट्टी के 108 दीपक रख 5 मंजिला चरकुला बनाया गया। महिलाओं द्वारा 108 जलते दीपकों के साथ चरकुला को सिर पर रख मदन मोहन जी के मंदिर के निकट चरकुला नृत्य किया जाता है। वर्ष 1930 से 1980 तक यह नृत्य लक्ष्मी देवी, अशर्फी देवी ने किया।
पूर्व में इसका वजन 60 किलोग्राम था। वर्तमान में इसका वजन 40 किलोग्राम है। पहली बार विदेश जाने वाले कलाकारों में शामिल छगन लाल शर्मा ने बताया कि 1980 से पहले चरकुला नृत्य गांव की सीमा से बाहर नहीं गया था। बदलती सोच और समय के अनुसार सबसे पहले चरकुला नृत्य का आयोजन श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा में किया गया। इसके बाद छगन लाल चरकुला नृत्य के लिए लक्ष्मी देवी के साथ मॉरीशस गए। इसके बाद ब्रज के साथ-साथ विदेशों में भी चरकुला नृत्य की मांग बढ़ने लगी।