लंबित वादों का बढ़ता बोझ न्याय में विलंब का कारण बन रहा है। इसके चलते गंभीर अपराधों के मामलों में न्याय मिलने में अनावश्यक देरी होती है। माना जा रहा है कि लोग अपने अधिक से अधिक मामले लोक अदालतों में निपटाएं तो लंबित वादों का बोझ कम होगा और पीड़ित लोगों को त्वरित न्याय का लाभ मिल सकेगा।
मथुरा में कुल 36 न्यायालय हैं। इनमेें लंबित वादों की संख्या का आंकड़ा 90 हजार के करीब है। इन केसों में बड़ी संख्या सुलह योग्य आपराधिक वादों, सिविल वादों, भूमि अधिग्रहण वादों, पारिवारिक वाद, स्टाम्प वाद, उपभोक्ता फोरम वाद, राजस्व वाद, चकबन्दी वाद, श्रम मामले, नगर निगम टैक्स वसूली मामले, जलकर एवं गृहकर आदि की है।
इन मामलों का निस्तारण सुलह-समझौतों के आधार पर हो सकता है। अगर इस प्रकार के मामलों का निस्तारण लोक अदालत के माध्यम से हो जाए तो एक तरफ न्यायालय में वादों की संख्या कम होगी वहीं गंभीर मामलों के परीक्षण और निर्णय की गति तेज होगी। ऐसे में पीड़ित को त्वरित न्याय की अवधारणा भी सार्थक हो सकेगी।
राष्ट्रीय लोक अदालत में
विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव पवन कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि 12 दिसंबर को आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत के लिए अभी तक कुल 22 हजार वाद नियत कर लिए गए हैं। हमारा प्रयास अधिक से अधिक वादों को नियत करने का है ताकि बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा सुलह और समझौते के आधार पर किया जा सके।
लोक अदालत में वादकारियों को सस्ता और सुलभ न्याय मिलता है। जो वाद सुलह-समझौते के आधार पर निपट सकते है, उन्हें अधिक से अधिक संख्या में राष्ट्रीय लोक अदालत में शामिल किया जा रहा है। ताकि वादकारियों को न्याय मिल सके और न्यायालयों से अतिरिक्त वादों का बोझ कम हो सके।
- दिनेश कुमार सिंह, जिला जज, मथुरा