लठामार होली के लिये ढाल तैयार करती कुसम व ज्योति
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बरसाना। लठामार रंगीली होली में काम आने वाली ढालों को बनाने का जिम्मा उठा रही हैं राधा के गांव की बहुएं। वैसे तो राधाकृष्ण की अलौकिक लठामार होली नारी शक्ति की अपने आप मे एक मिसाल है, लेकिन नारी किसी से कम नहीं इस बात का संदेश बरसाना की नारी ढाल बना कर दे रही हैं।
बरसाना नंदगांव की प्रेमपगी लठामार होली लाठियों और ढाल के बीच खेली जाती हैं। इसमें बरसाना की राधा स्वरूपा हुरियारिनें लाठियां थाम कर नंदगांव के हुरियारों पर मारतीं हैं। लाठियों के बचाव में नंदगांव के कृष्ण स्वरूप हुरियारे ढाल थाम लेते हैं।
हुरियारिनों की प्रेमपगी लाठियों को ढाल से रोकते हैं। ऐसी अनूठी लठामार होली में खड़ी ब्रजभाषा के बीच बड़ा ही आनन्द और रंग बरसात है। जब नंदगांव के हुरियारे ब्रज भाषा के तीर हुरियारिनों पर चलाते हैं तो इसका जवाब हुरियारिनें लाठियां चलाकर देती हैं।
ऐसी अलौकिक होली में प्रयोग होने वाली ढाल को तैयार करने की जिम्मेदारी का वजन अपने कंधों पर राधा के गांव बरसाना की महिलाओं ने लिया है। जिन ढालो को बनाने का वजन बरसाना के रमेश चंद सैनी व उसके पूर्वज उठाते आये हैं। उसी क्रम में रमेशचंद के घर की महिलाओं ने अपने कंधों पर उठा लिया है।
बातचीत
हमारे पिता नन्नूराम सैनी भी ढाल बनाने का काम करते थे। इस वर्ष हमारे परिवार की नारियों को बीस ढाल बनाने का काम मिल चुका है। मेले तक यह संख्या और बढ़ सकती हैं। मेरे घर में मेरी पत्नी व बहुओं ने ये जिम्मेदारी ली है। अब ढाल बनाने के लिए पहले की तरह चमड़े का प्रयोग नहीं किया जाता है। उसके स्थान पर रबड़ की मोटी चादर इस्तेमाल होती है। एक ढाल की कीमत डेढ़ हजार से चार हजार तक है।
- रमेशचंद सैनी ढाल बनाने वाले
लठामार होली में ढाल बनाने का काम हमारे ससुर ओर पति अभी तक करते आ रहे है।इस बार से घर की। महिलाओं ने पुरुषों के साथ ढाल तैयार कर रही है। इसमें मैं और मेरे बेटों की तीनों बहुएं गीता, ज्योति और निशा भी ढाल बना रही हैं।
- कुसुम सैनी ढाल बनाने वाली