बरसाना। आतिशबाजी की रोशनी में चमकते चेहरे... एक-दूसरे को गले लगाते सेवायत... और बरसाने की गलियों में बंटती मिठाइयां। लाडली जी महाराज के मंदिर में छाई यह खुशी बरसों से दबे इंतजार के बाहर आने की थी। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि जिस दिन का लंबे समय से इंतजार था, वह आखिर आ गया। सेवायत इसे अपनी जीत मान रहे थे। खुशी इस बात की थी कि अब लाडली जी महाराज के मंदिर की कमान रिसीवर के हाथ में नहीं रहेगी।
इस कहानी की शुरुआत 17 साल पहले हुई थी। वर्ष 2009 में मंदिर की व्यवस्था को लेकर विवाद अदालत तक पहुंचा। इसके बाद मंदिर की व्यवस्था रिसीवर के माध्यम से संचालित होने लगी। वक्त गुजरता रहा। वर्ष 2019 और फिर 2026 में भी इससे जुड़े मामले अदालत पहुंचे। तारीखें बदलती रहीं, लेकिन मंदिर की व्यवस्था नहीं बदली। सेवायतों की नजर उस दिन पर टिकी रही, जब लाडली जी की सेवा-व्यवस्था फिर उनके बीच लौटेगी।
कागजों पर भी इस बदलाव की जमीन पहले ही तैयार हो चुकी थी। चार सितंबर को मंदिर संचालन के लिए 18 सदस्यीय प्रबंध समिति बनाई गई थी। हरिओम गोस्वामी को सभापति की जिम्मेदारी दी गई। यानी अदालत के फैसले के बाद नई व्यवस्था खड़ी करने की जरूरत नहीं थी, सिर्फ मंदिर की चौखट तक उसे पहुंचाने का इंतजार था। अब रिसीवर से प्रभार मिलते ही यही समिति लाडली जी महाराज की सेवा और मंदिर की व्यवस्था संभालेगी।
यही वजह है कि सेवायतों की खुशी सिर्फ मुकदमा खत्म होने तक सीमित नहीं रही। उन्हें बरसों बाद वह तस्वीर दिखाई दी, जिसमें मंदिर की व्यवस्था उनके बीच लौटती नजर आ रही है। आतिशबाजी इसी लौटती उम्मीद का जश्न थीझ लाडली जी के दरबार में उस शाम रोशनी कुछ ज्यादा थी। बरसों से चली आ रही कानूनी खींचतान के बीच जिस दिन का इंतजार था, उसकी आहट मिल चुकी थी। अब तीन दिन बाद होने वाला प्रभार हस्तांतरण इस खुशी को औपचारिक रूप देगा। सेवायतों के लिए यह सिर्फ व्यवस्था बदलने का दिन नहीं, बल्कि लंबे इंतजार के बाद लाडली जी की सेवा से जुड़ी अपनी भूमिका लौटने का क्षण होगा।