वृंदावन (मथुरा)। श्रीबांकेबिहारी महाराज की लीलाएं अद्भुत और अलौकिक हैं। सात दशक पूर्व होली महोत्सव के दौरान ठाकुरजी की एक अनोखी चाटभोग लीला के कारण बिहारीजी मंदिर में दैनिक रसोई भंडारे की शुरुआत हुई। बताते हैं कि भगवान को चटपटा दहीबड़ा खाने की इच्छा हुई लेकिन उस दिन भोग में यह नहीं बना था। भक्तवत्सल प्रभु ने तब बालक रूप धारण किया और स्वयं वृंदावन बाजार जा पहुंचे।
इतिहासकार श्रीहरिदास पीठाधीश्वर आचार्य प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि उस समय वृंदावन में अधिकतर दुकानें बंद हो चुकी थीं लेकिन एक वृद्ध चाट विक्रेता अपनी दुकान समेटने ही वाला था। तभी नन्हे बालक के रूप में भगवान वहां पहुंचे और विनम्र स्वर में बोले -बाबा, मेरौ बढ़ौ मन कर रह्यौ है, एक दहीबड़ा बच्यो होय तौ खबाय देऔं। दुकानदार ने पैसे की मांग की, तो ठाकुरजी ने अपने कर-कमलों में पहना स्वर्ण कड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा -बाबा, पैसा तो नांय, पर यह सोने को हमारौ कढ़ा राखिलेऔ, सवेरे हमारे परिजन पैसा देके जाय लै जाँगे। स्वर्ण कड़ा देखकर दुकानदार को लगा कि यह किसी धनाढ्य परिवार का बालक है, इसलिए उसने भक्तवत्सल प्रभु को प्रेमपूर्वक भरपेट चाट-दहीबड़ा खिला दिया। भगवान तृप्त होकर अपने शयनागार लौट गए।
अगली सुबह जब मंदिर के पुजारियों ने भगवान की सेवा प्रारंभ की तो श्रीबांकेबिहारीजी के हाथ से स्वर्ण कड़ा गायब पाया। चारों ओर खोजबीन शुरू हुई और यह समाचार पूरे वृंदावन में फैल गया। इसी बीच वह वृद्ध चाट विक्रेता हांफता-कांपता मंदिर पहुंचा और हाथ में सोने का कड़ा लिए प्रभु के चरणों में गिर पड़ा।
वह भक्तिभाव से गदगद होकर कहने लगा, हे प्रभु! मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि स्वयं आप ही बालक रूप में मेरे पास आए थे। यह कड़ा लीजिए, मैंने आपकी चाट खिला दी थी।
भगवान की इस अद्भुत लीला को देखकर भक्तों ने यह समझा कि यह ठाकुरजी का संकेत है कि मंदिर में नियमित रूप से भोग प्रसाद की व्यवस्था की जाए। इसीलिए वर्ष 1957 में सेवायत समाज द्वारा दैनिक भोग रसोई भंडारा प्रारंभ किया गया और तब से हर वर्ष होली पर ठाकुरजी को चाट-दहीबड़े का विशेष भोग समर्पित किया जाता है। संवाद
यह लगते हैं ठाकुरजी को भोग
प्रातःकालीन भोग: बालभोग का दिव्य प्रसाद : सुबह दर्शन खुलने से पहले भगवान को माखन-मिश्री, दूध-मलाई की खीर, बेसन-मूंग दाल का हलुआ, बेसनी पकौड़ी, नमकीन सुहाली, मेवे मिश्रित दूध और मौसमी फलों का भोग अर्पित किया जाता है।
शृंगार आरती भोग: विशिष्ट पकवानों की झलक : इसमें बड़े लड्डू, कचौड़ी, बालूशाही, चौड़ी पूड़ी, आलू की सूखी सब्जी आदि भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
राजभोग: ठाठ-बाट से सजता है प्रभु का दोपहर भोज: दोपहर में बिहारीजी को सादा और मीठे चावल, विशेष तलेमा परांठा, कढ़ी, रसीली और सूखी सब्जियां, अचार, पापड़, चटनी, मूठिया के लड्डू, खीर एवं दूधभात अर्पित किया जाता है।
उत्थापन भोग: संध्या के समय हल्का प्रसाद : संध्याकालीन उत्थापन भोग में भगवान को समोसा, पकौड़े, सांख (मीठा पकवान) और हल्की मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। शयनभोग: रात का दिव्य भोजन: रात्रि शयन से पूर्व ठाकुरजी को नमकीन पूड़ी, बेड़ई, छोटी कचौड़ी, मिस्सा परांठा, दहीबड़ा, सोंठ गुजिया, रायता, सब्जियां, दूधभात और विशेष ऋतु आधारित मिष्ठान का भोग लगाया जाता है।
रात्रि विश्राम में प्रभु के निकट रखी जाती हैं दिव्य सामग्रियां : शयन के उपरांत ठाकुरजी के निकट स्वर्ण-रजत पात्र में यमुनाजल, कटोरदान में बूंदी के लड्डू और पानवीरा रखा जाता है ताकि जब भी भगवान की इच्छा हो वे इनका आनंद ले सकें।
इत्र और पानवीरा के विशेष प्रेमी हैं बिहारीजी : श्रीबांकेबिहारीजी इत्र से मालिश एवं पानवीरा के अत्यंत शौकीन हैं। प्रत्येक दिन चार बार मौसमी इत्रों से उनकी मालिश की जाती है और सभी भोगों के साथ उन्हें विशेष रूप से तैयार किया गया पानवीरा अर्पित किया जाता है।