धर्मवीर सिंह आर्य
छाता। भागदौड़ भरी जिंदगी में भले ही लोग घरों में मिक्सी से चटनी पीसते हैं, लेकिन सिल बिट्टे की चटनी का स्वाद अलग ही आता है। सिल बट्टे की चटनी खाकर जीभ भी चटखारे लेने लगती है।
बदलते समय के साथ घरों से सिल बट्टा लुप्त होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी के लोगों ने इनकी जगह मिक्सी मंगा ली हैं। लेकिन सिलबट्टे और मिक्सी की चटनी के स्वाद में अंतर है। वहीं बाजार में मिक्सी आने से पत्थर के सिलबट्टा बनाने वाले कारीगरों की रोजी पर संकट आ गया है।
छाता के गांव तरौली स्थित स्वामी बाबा मेले में सिल बट्टा बनाने वाले कई परिवार अपनी दुकानें सजाए हुए हैं। मथुरा के स्टैट बैंक चौराहा निवासी महेंद्र कुमार व राजेश ने बताया कि वह सिल, बट्टा, कुन्दी, खरल आदि बनाते हैं। यह चटनी, बादाम तथा दवाइयां आदि पीसने के काम आते हैं। हरा धनियां, मिर्च की चटनी सिलबट्टे पर पीसने से जो स्वाद आता है वह मिक्सी की चटनी में नहीं है। वहीं मनोज ने बताया कि उनके परिवार के 15 लोग इसी कार्य से गुजर-बसर कर रहे हैं। संवाद
250 से 400 में बिक रहे
मेले में 250 से 400 रुपये प्रति जोड़ा सिल बट्टे बेचे जा रहे हैं। कारीगर महेंद्र कुमार ने बताया कि मेले में उनके पास कई साइज के सिल बट्टे हैं। इनमें सबसे छोटा 250 रुपये का है। वहीं 300, 350 और 400 रुपये प्रति जोड़ा सिल बट्टे भी उपलब्ध है।