सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार जगत का निर्माण ब्रह्माजी ने किया है। इसके बावजूद त्रिदेव में गिने जाने वाले ब्रह्माजी के मंदिर भारत में कम ही हैं। राजस्थान के पुष्कर के बाद मथुरा के चौमुंहा में ही इनका दूसरा मंदिर माना जाता है। यहां ब्रह्मझाड़ी नामक स्थान पर प्रतिवर्ष भाद्रपद पूर्णिमा के दिन मेला और दंगल का आयोजन किया जाता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं।
कस्बा स्थित ब्रह्मझाड़ी में 16 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर मेला और कुश्ती दंगल का आयोजन किया जाएगा। इसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। ब्रह्मझाड़ी के बारे में मान्यता है कि आकाश मार्ग से गुजरने के दौरान एक बार ब्रह्माजी ने पृथ्वीलोक पर श्रीकृष्ण को ग्वाल बाल के साथ गाय चराते देखा। श्रीकृष्ण ग्वालवालों के साथ भोजन कर रहे थे और उनका झूठा भी खा रहे थे। यह देख ब्रह्माजी ने उनके ईश्वर होने पर संदेह किया।
ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए उनकी गाय और बछड़े झाड़ी में छिपा दिए। लौटकर देखा तो श्रीकृष्ण उन्हीं गायों को चरा रहे थे। फिर गुफा गए तो वहां सभी गाय-बछड़े बंधे मिले। इस पर ब्रह्माजी ने भगवान कृष्ण की लीला जानी और उनसे माफी मांगी। मान्यता है कि इसके बाद ब्रह्माजी ने इसी झाड़ी में तप किया। जो बाद में चौमुंहा क्षेत्र में ब्रह्मझाड़ी के नाम से विख्यात हुई। कालांतर में यहां जमीन से एक प्रतिमा मिली।
उसे निकाल कर यहां ब्रह्माजी के मंदिर का निर्माण कराया गया। तब से यहां लाखों श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन को आते हैं। मान्यता है कि ब्रह्माजी के चार मुंह होने के कारण कस्बे का नाम चौमुंहा पड़ा है। यहां बसे गांव का नाम पहले चौमुख था जो बाद में चौमुंहा हो गया।
श्राप के चलते नहीं पूजे जाते ब्रह्माजी
ब्रह्माजी की पूजा न होने के पीछे एक कथा प्रचलित है। बताया जाता है कि ब्रह्माजी और विष्णुजी में एक बार आपस में बड़े को लेकर बहस छिड़ गई। इस दौरान वहां पहुंचे भगवान शिव ने समाधान के लिए प्रतियोगिता रखी। इसमें ब्रह्माजी ने झूठ बोल दिया। इस पर भगवान शिव ने उन्हें श्राप दिया कि कलियुग में उनकी पूजा नहीं होगी।