श्राद्ध पितृ ऋण चुकाने की प्रक्रिया है। इसके लिए पूर्वजों (पुरखों) के प्रति कृतज्ञता का भाव जरूरी है। माना जाता है जिनके मन में पुरखों के प्रति श्रद्धा नहीं वे श्राद्ध करने के अधिकारी नहीं हैं। 16 सितंबर शुक्रवार से पितृ पक्ष आरंभ हो रहा है। पितरों का विसर्जन 30 सितंबर को अमावस्या के दिन होगा। इस बार चतुर्थी और पंचमी का श्राद्ध एक ही दिन 20 सितंबर को किया जाएगा।
महर्षि कार्ष्णाजनि के अनुसार इन दिनों सूर्य के सिंह से कन्या राशि में प्रवेश करने के कारण पितरों को तेज भूख लगती है। वे यमराज के निर्देश पर मृत्युलोक में आते हैं। महर्षि वेद व्यास के अनुसार जो व्यक्ति श्राद्ध के जरिए अपने पितरों को संतुष्ट करता है, वह पितृ ऋण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।
मान्यता यह भी है कि श्राद्ध के समय उच्चारित नाम, गोत्र और मंत्रों से श्राद्ध में अर्पित दृव्य वायु रूप में प्रविष्ट होकर पितरों को प्राप्त होते हैं। श्राद्ध के दृव्य तिल, उड़द, जौ, चावल, जल, कंदमूल, फल और घी हैं। तिल व उड़द की दाल का प्रयोग आवश्यक माना गया है।
भगवान राम ने किया था दशरथ का श्राद्ध
दीपक ज्योतिष भागवत संस्थान के निदेशक पंडित कामेश्वर चतुर्वेदी बताते हैं कि भगवान श्रीराम ने पितृ पक्ष में नासिक में गोदावरी के तट पर महाराजा दशरथ का श्राद्ध किया था। गया में पांडवों ने राजा पांडु का श्राद्ध किया। धर्मसिंधु शास्त्र के अनुसार निर्धन व्यक्ति गाय को चारा खिला दें और पितरों का श्रद्धा के साथ स्मरण करें तो भी पितृ संतुष्ट हो जाते हैं।
मथुरस्थ सर्वकर्म पांडित्य समिति के संगठन मंत्री अमित शर्मा भारद्वाज के अनुसार गरुण पुराण में उल्लेख है तिल प्रभु के पसीने की बूंद है। पितरों का आवास दक्षिण दिशा में होने के कारण श्राद्ध दक्षिणामुख होकर और जनेऊ को दाहिने कंधे पर रख किया जाता है। श्राद्ध में जड़ सहित कुशा का प्रयोग करना चाहिए। कुशा का ऊर्ध्वभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का व जड़ें पितरों की होती हैं।
आज से मांगलिक कार्याें पर ब्रेक
16 सितंबर शुक्रवार से 15 दिन (श्राद्ध पक्ष) तक सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों पर पर ब्रेक लग जाएगा। गृह प्रवेश, दुकान का उद्घाटन, नए कार्यों का शुभारंभ, नामकरण संस्कार आदि सभी मांगलिक कार्य नहीं होंगे। इन दिनों नया सामान न खरीदने के विचारों के चलते बाजारों में सन्नाटा रहेगा। आमतौर पर इन 15 दिन बाजार में मंदी रहती है। श्राद्ध पक्ष में मिष्ठान के रूप में इमरती का चलन बढ़ जाता है। अधिकांश मिष्ठान विक्रेता इस दौरान ही इमरती बनाते हैं।
श्राद्ध पक्ष के दौरान प्रतिदिन ठाकुरजी का भोग लगाकर गौ ग्रास निकालने, श्राद्ध की तिथि के दिन गौ ग्रास के अलावा कौआ, कुत्ता, जलचर जैसे कछुआ, मछली का भी ग्रास निकालने का वर्णन ग्रंथों में है। श्राद्ध के दिन विद्वान और सात्विक ब्राह्मण को श्रद्धा के साथ भोजन कराकर भेंट और उपहार देकर आचार्य के निर्देशन में तर्पण करना चाहिए।
वहीं इन दिनों दिन में सोना, असत्य बोलना, रति क्रिया, सिर व शरीर पर तेल, साबुन, इत्र लगाना, मदिरापान, अनैतिक कृत्य, वाद-विवाद, जुआ खेलना और किसी जीवधारी को कष्ट पहुंचाने को अक्षम्य माना गया है।