अमर उजाला के बसंत उत्सव में सूफी गायकी मंच पर आई तो गुलाबी ठंड की चादर ओढ़े शाम में गरमाहट महसूस होने लगी। राजस्थानी शब्दों में लिपटे गीतों को सुन समारोह में मौजूद श्रोता झूमने लगे। तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूंज उठा।
कविताओं का रसपान करने के बाद हंसी ठिठोली ने श्रोताओं को गुदगुदाया। शाम गहरी हो रही थी ऐसे में गुलाबी सर्दी ने सिहरन पैदा कर दी। मंच पर सूफी गायक मामे खान अपने कलाकारों की टीम के साथ आ गये। सूफी गायकी के ढोल की थाप, राजस्थानी लोकभाषा के शब्दों में लिपटे गीतों ने श्रोताओं को साहित्यिक गरमाहट का अहसास कराया।
आबौरी पधारौ म्हारै देश..... केसरिया बालम गीत पर लोग झूमने लगे। राजस्थानी वेशभूषा में सजे धजे कलाकारों के भाव, भंगिमा लोगों को आकर्षित कर रही थी। इस गायकी की समझ रखने वालों की तो मानो मूंह मांगी मुराद पूरी हो गई। गायक मामे खान की एक से बढ़कर एक प्रस्तुति ने लोगों का मन मोह लिया।
‘थारी शरारत में मैं सब जानूं चौधरी’ गीत पर लोग थिरकने लगे। ‘हो लुक छुप न जावौ जी, अरे क्यौं इतनौ तरसाओ जी, म्हारे शकल दिखाऔ जी’.... गीत पर लोग अपनी जगह खड़े होकर नाचने लगे। समारोह में शामिल हर शहरवासी प्रफुल्लित था। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों पर युवा नाच गा रहे थे।
बसंत उत्सव की ओर चल पडे़ कदम
गीत संगीत और हंसी ठहाकों की महफिल बसंत उत्सव को देखने के लिए शनिवार को आम और खास के कदम मसानी चौराहा स्थित मुकुंद विहार की ओर चलते नजर आए। कार्यक्रम को लेकर लोगों की उत्सुक्ता इस कदर अधिक थी कि शाम से शुरू हुआ लोगों के यहां पहुंचने का दौर देर रात तक अनवरत जारी रहा। राह चलते लोगों के कदम गीत संगीत की इस महफिल से आ रही हंसी ठहाकों की आवाजों को सुनकर ठिठक गए।