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‘अरी चल नवल किशोरी, भोरी गोरी होरी खेलन जाई’

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नंदगांव (मथुरा)। ब्रज के मंदिरों में समाज गायन कर उत्सव मनाने की प्राचीन परंपरा है। इन दिनों होली के दौरान सभी मंदिरों में इस परंपरा के रंग नजर आ रहे हैं। मंदिरों में हो रहे समाज गायन में शामिल गोस्वामीजन ही नहीं भक्त भी झूम रहे हैं। इस दौरान गोस्वामीजनों द्वारा अरी चल नवल किशोरी, भोरी गोरी होरी खेलन जाई, फगुवा मिस ब्रज सुंदरी जसुमति गृह आई आदि पद गाए जा रहे हैं। माना जाता है कि ब्रज मंडल में करीब पांच हजार मंदिर हैं।
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ब्रज मंडल के अधिकांश प्राचीन मंदिरों में भक्ति के लिए श्रवण, कीर्तन और स्मरण समाज गायन के रूप में किया जाता है। यहां के मंदिरों में समाज गायन कर उत्सव मनाने की प्राचीन परंपरा है। इसमें अधिकांशत: अष्टछाप के कवियों की रचनाओं को प्रमुख स्थान मिलता है। समाज गायन में एक-एक पंक्ति के चौथाई चरण और अन्य अंशों को बार-बार दोहराया जाता है।
इसमें स्वर, ताल, लय और शब्द योजना ही मुख्य अंग होता है। तानपूरा, झांझ और मृदंग इसके मुख्य अंग हैं। वर्तमान में हारमोनियम व ढप आदि का भी प्रयोग किया जा रहा है। समाज गायन में वसंत, होली, वर्षा, झूला, जन्माष्टमी, रास, दीपावली, अन्नकूट आदि उत्सवों के अनुसार विभिन्न, राग, रागनियों में पदों का गायन किया जाता है।
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श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली नंदगांव में वसंत पंचमी से 40 दिवसीय होली के साथ ही समाज गायन का दौर शुरू हो गया है। यह समाज धूलहोली तक चलेगी। इसके लिए प्रयोग में लाई जाने वाली पोथी (पुस्तक) लगभग 450 वर्ष पुरानी है। इसमें वर्ष भर के उत्सवों का संकलन है। समाज गायन की परंपरा भी इतनी ही पुरानी मानी जाती है।
नंदगांव व बरसाना के समाज गायन में समानता
नंदबाबा मंदिर के सेवायत रमेश चंद गोस्वामी बताते हैं कि नंदगांव व बरसाना के समाज गायन में बहुत समानता है। संभवत: बरसाना, नंदगांव के मंदिरों में लगभग समान समय पर समाज गायन शुरू होता है।
नारायण भट्ट ने बरसाना में शुरू किया समाज गायन
श्रीजी मंदिर के सेवायत माधव गोस्वामी बताते हैं कि बरसाना में समाज गायन की शुरुआत दक्षिण में मदुरैपट्टनम के श्रीवत्स गोत्रिय तैलंग ब्राह्मण भास्कर भट्ट के यहां जन्मे श्रीनारायण भट्ट ने की। संवत 1602 में नारायण भट्ट ब्रज में आए। यहां उन्होंने ब्रज को प्राकट्य करने के साथ-साथ समाज गायन में गाए जाने वाले पदों का भी संकलन किया।
कुछ नए वाद्य यंत्र आए
नंदबाबा मंदिर के सेवायत संगीताचार्य राधारमण गोस्वामी बताते हैं कि समाज गायन में आजकल कुछ नए वाद्य यंत्र आ गए हैं। हारमोनियम, तानपुरा, झांझ, ढप, पखावज आदि का प्रयोग किया जा रहा है।
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