वृंदावन। जन्माष्टमी, नंदोत्सव के बाद अब श्रीकृष्ण के छठी पूजन की तैयारियां शुरू हो गई हैं। जन्माष्टमी के छठे दिन छठी महोत्सव को पूरे विधि विधान और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। यह दिन नंदलाल श्रीकृष्ण के नामकरण संस्कार, विशेष पूजन और बालरूप दर्शन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि ब्रज में यह परंपरा सदियों पुरानी है। छठी तिथि को ब्रजवासी अपने घरों में लड्डू गोपाल का विशेष शृंगार कर पूजा-अर्चना करते हैं। ब्रजवासी सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और घर-घर में पूजा स्थलों को सजाया जाता है। पीले या लाल वस्त्रों से सुसज्जित चौकी पर बालकृष्ण की प्रतिमा स्थापित कर पंचामृत से उनका अभिषेक किया जाता है। पूजन के बाद भगवान को कढ़ी, चावल, दूधभात, खीर, लड्डू, फल, फूल, माखन, मिश्री और तुलसी पत्र जैसे अनेक प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं।
शहद चटाने की विशेष परंपरा
पूजनोपरांत सबसे पहले बालगोविन्द प्रभु को शुद्ध शहद चटाकर, फिर अन्य भोग समर्पित किया जाता है। सेवायतों के अनुसार यह परंपरा भगवान के मधुर बचपन का प्रतीक है।
नामकरण की अनुपम परंपरा
इस अवसर पर ब्रजवासी अपने आराध्य श्रीकृष्ण को अपनी भावनाओं के अनुसार नाम देते हैं। कोई उन्हें कनुआ, कोई गिरधारी, कोई बांकेबिहारी, तो कोई मुरलीधर कहकर बुलाता है। इसी भावना से प्रेरित होकर अपने घरों में पूजे जा रहे बालकृष्ण का भी नामकरण किया जाता है।