नोटबंदी ने ईंट उद्योग की भी कमर तोड़ दी है। प्रदेश में पांच हजार ईंट भट्ठे इस सीजन में नहीं चलेंगे। हर साल नवंबर से सीजन शुरू हो जाता है मगर इस बार आधा दिसंबर बीतने के बावजूद भी पांच फीसदी भट्ठे भी शुरू नहीं हो पाए हैं। भट्ठे बंद होने से तीन लाख मजदूरों से काम छिन गया है।
उत्तर प्रदेश में पंजीकृत ईंट भट्ठों की संख्या 18000 है। मथुरा जनपद में करीब 150 भट्ठे हैं। यहां भी मुश्किल से बीस भट्ठों पर ही काम शुरू हो रहा है। अधिकांश ने लेबर को वापस घर भेज दिया है। जिन भट्ठों पर ईंट पथाई का काम चल भी रहा है उन्होंने लेबर आधी कर दी है। अगर 100 मजदूरों को लगा रखा था तो तीस से काम चलाया जा रहा है। ये स्थिति केवल मथुरा में ही नहीं बल्कि सर्वाधिक ईंट उद्योग वाले क्षेत्र बागपत, गाजियाबाद, शामली, मुजफ्फरनगर, हापुड़, मुरादाबाद, अमरोहा, संभल, बिजनौर, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, आजमगढ़ और महाराजगंज में भी है।
ईंट भट्ठा एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय गोयल ने बताया कि नवंबर के पहले सप्ताह से आमतौर पर भट्ठों पर ईंट पथाई का काम शुरू हो जाता है। लेकिन इस बार अभी तक पांच फीसदी भट्ठे भी नहीं चल पा रहे हैं। पांच हजार भट्ठे तो इस बार चल ही नहीं पाएंगे। एक ईंट भट्ठे पर कम से कम 70 मजदूर काम करते हैं। अधिकांश मजदूर बिहार, झारखंड और मध्यप्रदेश से आते हैं। सभी अपने घर को चले गए हैं। करेंसी है नहीं तो पेमेंट कहां से किया जाए। मजदूरों का यहां पर खाता भी नहीं है।
भट्ठों पर लगा है पुरानी ईंट का भंडार
ईंट भट्ठों पर पुरानी ईंट का भंडार लगा है। नोटबंदी के बाद से ईंट की बिक्री हो ही नहीं रही है। अब जब पुराना माल ही नहीं बिकेगा तो नया कहां से आएगा। ईंट भट्ठा स्वामी केदारनाथ उपाध्याय का कहना है कि कारोबार तो पूरी तरह से ठप हो गया है।
खर्च भी निकाल पाएंगे
भट्ठा मालिक सुधीर प्रधान का कहना है कि नोटबंदी से ऐसी मंदी आ गई कि निर्माण के काम भी कहां हो रहे हैं। पुरानी ईंट की भी बिक्री नहीं हो पा रही है। ऐसे में लोग खर्च भी नहीं निकाल पाएंगे। 80 कुंतल का तो ईंधन ही एक रोज में फुंक जाता है। लेबर का खर्च रहा हो वो अलग। 60 से 70 हजार का खर्च एक दिन का आता है। अब ऐसे में कारोबार कहां से हो।