उन्होंने पहले ग्रंथ की रचना महज 16 वर्ष की आयु में कर दी थी। इसका नाम भाव विलास था। शायद तब किसी को नहीं पता था कि वे रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाएंगे। एक बार लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अनवरत जारी रहा। उन्होंने अपने जीवनकाल में 72 ग्रंथों की रचना की थी।
महाकवि देव की नौवीं पीढ़ी के वंशज नित्यानंद दुबे बताते हैं कि 95 वर्ष की आयु तक उन्होंने लगातार लेखन प्रारंभ रखा। इसमें उनके द्वारा 72 ग्रंथों की रचना की गई। हालांकि इसमें से 15 ग्रंथ ही उपलब्ध हैं। वर्ष 1968 में महाकवि देव के निधन के साथ हिंदी के अध्याय का अंत हो गया।
महाकवि देव ने समाज के ऊपर ही अपने ग्रंथों की रचना की। उनकी रचनाओं में भाव विलास, जाति विलास, कुशल विलास चर्चित हैं। हाल ही में हमें मदन मोहन मालवीय जी के पौत्र से पता चला कि महाकवि देव की रचनाएं लंदन के एक म्यूजियम में भी संरक्षित हैं। ये हमारे और देश के लिए गर्व की बात है।
-कुलदीप दुबे, वंशज महाकवि देव