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जाति और धर्म भूलकर गोरों से लड़े क्रांतिकारी

Sun, 14 Aug 2016 11:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
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birsa munda, jharkhand birsa munda, birsa munda revolutionary - फोटो : ट्विटर
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वोटों की राजनीति में भले ही नेता जाति और धर्म के आधार पर लोगों को बांट कर अपना मकसद पूरा कर रहे हैं। मगर देश को आजाद कराने में जिले के क्रांतिकारी धर्म और जाति से ऊपर उठकर अंग्रेजी हुकूमत से लड़े थे। महात्मा गांधी के आव्हान पर जिले में 1921 से 1942 तक कंधे से कंधा मिलाकर गोरों से लड़े क्रांतिकारियों की एक लंबी सूची सरकारी अभिलेखों में मौजूद है। जिले के 350 से अधिक क्रांतिकारियों ने अपना परिवार छोड़कर जिले को इतिहास में दर्ज कराया है।
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सरकारी अभिलेखों के अनुसार सिकंदरपुर के उरुज मुअज्जम, कुरावली के गणेशचंद्र काछी, चतुरीपुर भोगांव के घासीराम, भारौल में जन्मे चौधरी कामता सिंह यादव, जयदेव सिंह, उदयभान सिंह, कल्होर के कुंवर गुलाब सिंह, ज्योंति के पंड़ित जीवालाल द्विवेदी, नगर के चौथियाना निवासी धर्म नरायन चतुर्वेदी, छपट्टी के डाक्टर भगवान दास, कुरावली के बाबू विशंभर दयाल सक्सेना, भोगांव के मन्नासिंह आजाद, कोसमा के बाबूराम कुलश्रेष्ठ, कुसमरा के बाबूराम पालीवाल, बेवर के बाबूराम गुप्ता, जवांपुर के भिखारीलाल, कुरावली के रमेशचंद्र सक्सेना, दरवाह घिरोर के राधामोहन पांडेय,  नगला कंचन घिरोर के डाक्टर श्याम बिहारी लाल कुलश्रेष्ठ, भोगांव के मिश्रीलाल दुबे, मैनपुरी नगर के मोहल्ला मिश्राना के अमरनाथ मिश्रा भइये, भोजपुरा के डाक्टर आरएन वर्मा, सिरसागंज के माधौनरायण मुदगल, नवाटेढ़ा के छोटे सिंह आजाद, सुल्तानगंज के नत्थू प्रसाद मिश्रा, अंबरपुर के लक्ष्मण कुमार मिश्रा, बसबाई शिकोहाबाद के दुर्ग सिंह, बेवर के हीरालाल दीक्षित, रूपपुर किशनी के शिववक्ष सिंह राठौर, भदौरा भोगांव के ऊदल सिंह, लाखनमऊ के उजागर लाल जैसे तमाम क्रांतिकारियों को अपने परिवार की  बजाए भारत मां की चिंता हमेशा सताती रही। देश को आजाद कराने के लिए यह सभी क्रांतिकारी एक नहीं अनेक बार जेल गए।

देशभक्ति के नारे सुन बचपन से ही हो गए क्रांतिकारी  
मैनपुरी। बचपन से ही देश भक्ति के नारों को सुनकर उनके मन में ऐसा जज्बा जागा कि घर छोड़कर क्रांतिकारियों के साथ हो लिए। उनको मां-बाप की चिंता नहीं आजाद भारत में भावी पीढ़ियों के सांस लेने की चिंता सताती थी। यह कहानी है नगर के मोहल्ला सोतियाना में जौहरीलाल के परिवार में 16 दिसंबर 1917 को जन्मे परमानंद सोती की।
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नगर के मिशन स्कूल में कक्षा 10 तक की शिक्षा लेेने वाले परमानंद को ब्रिटिश हुकूमत की यातनाएं अंदर तक हिला देती थीं। 13 साल की उम्र में ही 1930 में कोलकाता कांग्रेस में भाग लेेने जा रहे परमानंद आसनसोल में पकड़े जाने के बाद जेल गए। जेल में गोरी हुकूमत की यातनाएं सहने के बाद इरादे और फौलादी हो गए। 1935 में कांग्रेस में शामिल हुए और 1936 में जिला कमेटी में सहमंत्री बनाए गए। अगस्त क्रांति के दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ पर्चे छापने और बांटने में दो सितंबर 1942 को जेल जाना पड़ा। 25 अप्रैल 1943 को जेल से छूटे तो फिर क्रांतिकारियों से संपर्क कर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने में जुट गए। गोरी हुकूमत का विरोध करने के कारण उनकी फर्म रघुनाथ दास चंद्रसेन को गल्ला आढ़ती का लाइसेंस तक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद भी नहीं दिया गया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो मोहल्ले के हर घर के साथ ही पूरे नगर में लोगों को एकत्रित कर जुलूस निकालने के बाद जश्न मनाया। आजादी के बाद वह कांग्रेस के जिलाध्यक्ष तथा 21 साल तक नगरपालिका के सभासद भी रहे। 

शहीदों की चिताओं पर अब कहां लगते मेले
मैनपुरी। साहित्यकार श्रीकृष्ण मिश्रा कहते हैं कि आज का समय बदल गया है। आज नेताओं को देश की नहीं अपनी चिंता है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस पर नेता ही नहीं अधिकारी भी आजादी के दीवानों को भूल जाते हैं। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले की बात अब इतिहास के पन्नों में ही दर्ज होकर रह गई है। 
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