मजहब-ए-इस्लाम का सबसे पाक महीना रमजान होता है। सोमवार को चांद दिखते ही रमजान का महीना शुरू हो गया। आज पहला रोजा होगा। इसके लिए लोगों ने सुबह सहरी करके रोजे की नियत की। रमजान का महीना मुस्लिमों में खास अहमियत रखता है। इस पूरे माह में लोग रोजा रखकर अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते हैं।
सोमवार को माह-ए-रमजान का चांद दिखते ही लोगों ने एक दूसरे को मुबारकबाद दी। मगरिब की नमाज के बाद लोगों ने सहरी की तैयारी की, तो रात में तरावीह पढ़ी गई। तरावीह में बड़ी संख्या में लोगों ने मस्जिदों का रुख किया। लोगों ने अलसुबह सहरी करके रोजे की नीयत करके रोजा रखा।
रमजान की अहमियत
मजहब-ए-इस्लाम में पांच अरकन होते हैं, जिसमें से रोजा भी एक अरकान है। यह वह महीना है जिसमें अल्लाह ताला ने अपनी पाक किताब कुरान-ए-पाक को बंदों की रहनुमाई के लिए इस जहान में उतारा। इस पाक माह में अल्लाह जन्नत के दरवाजे खोल देता है। एक नेकी के बदले सत्तर नेकियों का सवाब देता है।
कैसे टूटता है रोजा
जामा मस्जिद के पेश इमाम मोहम्मद शमी अहमद ने बताया कि रोजा जानबूझकर खाने-पीने और वुजू के दौरान हल्क में पानी चले जाने से टूट जाता है। रोजे की हालात में कुरान-ए-पाक की तिलावत, पांचों वक्त की नामज, दुरूद शरीफ पढ़ना जरूरी है। झूठ, बुराई और लड़ाई से दूर रहना चाहिए। गरीबों, यतीमों और विधवाओं की मदद करनी चाहिए।
कैसे रखा जाता है रोजा
सुबह सादिक (सूर्योदय से पहले) से लेकर गुरूब (सूर्यास्त) तक अपने आपको खाने-पीने से रोके रखना रोजा कहलाता है। मुंह के रोजे के साथ-साथ हाथ, कान, नाक, जुबान व आंखों का भी रोजा होता है। रोजे की हालात में किसी की बुराई करने, सुनने, बुरा देखने और कुछ सूंघने से बचें।
इफ्तार के वक्त इन बातों का रखे ध्यान
इफ्तार करते वक्त दुआ पढ़ना न भूलें, खजूर, छुआरा, पानी से रोजा इफ्तार करना चाहिए। इफ्तार के वक्त आजान होने पर ही रोजा खोलें। इफ्तार करते वक्त नमाज का भी ख्याल रखें। नमाज कजा न होने दें।
रमजान का इतिहास
मजहब-ए-इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने मुल्क अरब के शहर मक्का में स्थित पहाड़ी गारे हिरा की गुफा में दिन गुजारे। उन दिनों आप दिन में खाने से परहेज करते थे और रात में अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते थे। उन दिनों की याद ताजा करने के लिए मुसलमानों पर रोजे फर्ज किए गए हैं।
मस्जिदों में लगे आउडस्पीकर
मंगलवार को पाक रमजान माह के पहले दिन से ही सुबह तीन बजे से मस्जिदों से लाउडस्पीकर से सहरी की आवाज बुलंद होनी शुरू हो जाएगी। रमजान को देखते हुए मस्जिदों को आकर्षक ढंग से सजाया गया है। साथ ही टोलियां तैयार की गई हैं जो सुबह तीन बजे से मोहल्ले-मोहल्ले जाकर रोजदारों को सहरी के लिए उठाएंगी।
रोजा किस पर फर्ज है
12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए रोजा रखना फर्ज है। इसके अलावा हर औरत, आदमी जो अक्ल वाला और सेहतमंद हो उस पर रोजे रखना फर्ज है। बीमार लोग, गर्भवती औरत व पागल पर रोजा फर्ज नहीं है।
खजूर की सजीं दुकानें
रमजान को देखते हुए बाजार में भी कई प्रकार की सिवईं और खजूूर आ गई हैं। इसमें आमीर और फर्द खजूर 300 रुपये प्रति किलो, मदीना खजूर 180 रुपये किलो, रस्गुल्ला खजूर 320 रुपये प्रति किलो, इरानी खजूर 100 रुपये प्रति किलो बाजार में उपलब्ध है। वहीं सिवईं 90 से 200 रुपये प्रति किलो तक हैं।
बच्चे रोजा रखने को उत्साहित
इस बार रोजा करीब साढ़े पंद्रह घंटे का पड़ रहा है। इसके चलते बच्चे रोजा रखने में परेशान होंगे। 13 वर्ष की फरीन का कहना है कि गर्मियों के चलते स्कूल की छुट्टी चल रहीं है। उसे रोजा रखने में कोई परेशानी नहीं होगी। पर मैं रोजा जरूर रखूंगी।
इस बार 15 घंटे का रोजा पड़ रहा है। ऐसे में रोजदारों को सहरी के वक्त सबसे ज्यादा पानी पीना चाहिए। साथ ही धूप में न निकलें। रोजा खोलने के बाद गुलूकोज जरूर पीए। गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग रोजा न रखें। सिर्फ अल्लाह की इबादत करें
डा. नूर अहमद, फिजीशियन