बदलते समय में रामलीला का तरीका भी बदला है। पहले जहां मशाल जलाकर रात में रामलीला होती थी अब वहीं बिजली की रोशनी में रामलीला का मंचन होता है। पहनावा, मेकअप सब कुछ पहले से बेहतर है पर पहले जैसी आस्था लोगों में नहीं है। पहले गांव ही नहीं पड़ोसी गांवों केे लोग भी रामलीला देखने आते थे मगर अब तो गांव के लोग ही समय नहीं देते।
सुजरई रियासत के सहयोग से 1918 में अजीतगंज में शुरू हुई रामलीला की परंपरा आज भी चल रही है। गांव के बुजुर्ग आज की अपेक्षा पहले की रामलीला को अधिक बेहतर मानते हैं। ओमप्रकाश यादव बताते हैं कि 60 वर्ष पूर्व की वह रामलीला आज भी याद है जब मशालें जलाकर बाबूराम मिश्रा नंबरदार के चबूतरे पर मंचन होता था। 1944 में जगह कम पड़ने पर शिव मंदिर के पास रामलीला का मंचन शुरू किया गया। जो आज भी जारी है। सरजूदयाल मिश्रा कहते हैं कि पहले की तरह आज की रामलीला नहीं है। अभी भी गांव के कलाकार ही अभिनय करते हैं। जिसके लिए एक महीने पहले से ही अपने पात्र के मंचन की तैयारी शुरू कर देते हैं। पहले दूर दराज के लोग बैल गाड़ियों से रामलीला देखने आते थे लेकिन अब तो गांव के लोग ही समय नहीं देते हैं।
अवध नरेश के रुप मेें बन गई पहचान
राधारमण मिश्रा को गांव की रामलीला में दशरथ के पात्र के मंचन के लिए लोग आज भी देखने आते हैं। उनकी पहचान ही अवध नरेश के रुप में हो चुकी है। राम वनगमन के बाद दशरथ विलाप के भावपूर्ण मंचन को देख लोगों की आंखों में आज भी आंसू आ जाते हैं। उनकी लाइनेें- मेरे रामदुलारे आ जा, मेरे गम के सहारे आ जा, सूना सूना है अवध, मुझे दरस दिखाने आ जा सुनने के लिए लोग इंतजार करते हैं।
काम छोड़कर करते हैं एक माह तैयारी
बांकेलाल शर्मा का सुमंत का मंचन यादगार है। रामलीला शुरू होने से एक माह पहले से ही वह सारे काम छोड़कर अपना पाठ याद करने में लग जाते हैं। राम को वन में छोड़कर रोते हुए अयोध्या आते समय उनकी लाइनें- हे प्रभो गर देश में उनका बिगाना हो गया, रात दिन उन तीनों का आंसू बहाना हो गया। जो कभी सोते थे गद्दों पर पड़े आराम से, आज उनका घास पर ही आशियाना हो गया।