भोगंाव। सूफी मौलवी अब्दुल गली खां का उर्स बड़े ही शान-ओ-शौकत के साथ मनाया जाता है। इसकी तैयारियों को अमलीजामा पहना दिया गया है। गुरुवार से शुरू हो रहे उर्स के लिए अकीदतमंद, जायरीन और मुरीद आ चुके हैं। आज से दरबार में हाजिरी लगाने वालों का सैलाब उमड़ेगा। लोगों की अकीदा है कि यहां पर सच्चे दिल से मांगी जाने वाली हर मुराद पूरी होती है। यहां पर मजहबों की दीवार टूटती नजर आती हैं।
सूफी संत हाजी मौलवी अब्दुल गनी साहब के मुकद्दस मजार पर हाजिरी लगाने को देश ही नहीं विदेशों से भी अकीदतमंद उर्स के दौरान आते हैं। इनकी पैदाइश फर्रुखाबाद जिले के कस्बा कायमगंज में हुजूर हसन खां साहब पठान घराने में हुआ था। 13 वर्ष की उम्र में उनके पिता कुबेरपुर में खलीफा हाजी अहमद अली खां के पास तालीम हासिल कराने के लिए उन्हें छोड़ आए थे। जहीन (बुद्धिमान) होने की वजह से हमेशा सर्वोच्च स्थान हासिल किया। कस्बा भोगांव में सहायक अध्यापक बाद में डिप्टी इंस्पेक्टर बना दिए गए। वर्ष 1933 में अवकाश प्राप्त किया। बताते हैं कि सूफी संत का कस्बे के प्रख्यात महात्मा रामचंद्र महाराज और महात्मा रघुवर दयाल से विशेष लगाव था। जिंदगी के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा कि यदि मुझे कब्रिस्तान में दफनाया गया तो हमारे दूसरे मित्र और शिष्य मुझसे कट जाएंगे इसलिए ऐसे स्थान का चयन किया जाए जहां सभी धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव के आ सके। इतना सुनते ही उनके मित्र महात्मा रघुवर दयाल ने अपनी 16 बीघा जमीन इस संत के नाम कर दी और फिर 30 मार्च 1942 को महान संत ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। आखिरी ख्वाहिश के तहत उन्हें उसी 16 बीघा जमीन में दफनाया गया। जहां हर वर्ष 24, 25, 26 दिसंबर को सालाना उर्स लगता है।