तीन दिन पहले कलक्ट्रेट परिसर में मिले नरमुंडों की असलियत जानने के लिए अधिकारी उनकी फारेंसिक जांच कराएंगे। यही नहीं कलक्ट्रेट स्थित जिस कमरे में कंकाल निकलने से सनसनी फैली थी वह कमरा मालखाने का न होकर भू-अभिलेख विभाग का था। यह जानकारी जांच के दौरान मालखाने के प्रभारी और उनके सहायक ने दी है। इससे जांच की दिशा ही बदल गई है। वहीं एएसपी दिगंबर कुशवाह का कहना है कि मामले की जांच सीओ सिटी कर रहे हैं।
बता दें कि 20 जून को कलक्ट्रेट परिसर स्थित एक पुराने भवन को ढहाया जा रहा था। इसी दौरान एक कमरे के अंदर से तीन नरमुंड मिले थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में कारतूस और बंदूकों के बट भी मिले थे। तब जिला स्तरीय अधिकारियों ने पूछने पर बताया था कि उक्त भवन मालखाने का है। इसके चलते यहां से खोपड़ियां और अन्य सामान मिला है। इस संबंध में जब कलक्ट्रेट परिसर स्थित मालखाने के प्रभारी अवधेश सिंह और उनके सहायक रहमान अली से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उक्त भवन कभी मालखाने का नहीं रहा। रहमान अली ने बताया कि इस भवन पर भूलेख अनुभाग की पट्टिका लगी थी। वे पूर्व में 1997 में भी यहां मालखाने में तैनात रहे थे। तब भी उक्त कमरे का ताला लगा रहता था। इसकी चाबी भी कभी किसी अधिकारी के पास नहीं रही। उन्होंने बताया कि उक्त कमरे को कभी खोला ही नहीं गया। मालखाने के प्रभारी अवधेश सिंह ने बताया कि चूंकि उक्त भवन में कभी मालखाना नहीं रहा इसलिए वहां रखी वस्तुओं का रिकार्ड भी हमारे यहां नहीं हो सकता।
एएसपी दिगंबर कुशवाह ने बताया कि जांच में यह बात सामने आई है कि 1997 से उक्त कमरे का ताला नहीं खुला है। इसका मतलब उससे पूर्व में ही यहां नरमुंड या अन्य सामान रखा गया होगा। नरमुंड कितने पुराने हैं इसकी पुष्टि के लिए आवश्यकता पड़ी तो उनकी फारेंसिक जांच कराई जाएगी। उसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
20 साल पहले कहां से आए नरमुंड
सवाल यह उठता है कि जब पोस्टमार्टम के बाद कभी भी मालखाने या कहीं पर भी कंकाल नहीं रखे जाते हैं तो ऐसे में इन खोपड़ियों को रखने की वजह क्या हो सकती है। अधिकारी बताते हैं कि मौके पर कहीं भी ऐसे सबूत नहीं मिले जिससे यह लगता हो कि किसी तंत्रमंत्र के लिए इनका प्रयोग किया गया होगा। अभी जांच का मुख्य बिंदू यही है कि आखिर खोपड़ियों को वहां रखने की वजह क्या है।
अंग्रेजों के शासन में बने हैं भवन
मैनपुरी। कलक्ट्रेट में इस भवन समेत अधिकांश 1940 में अंग्रेजों के समय के बने हुए हैं। कुछ ने बताया कि यहां पर पहले पोस्टमार्टम हुआ करता था। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि किसी ने नहीं की है। भूलेख अनुभाग होने की बात तो कई अधिकारी बता रहे हैं।