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अलम के जुलूस में गूंजी या हुसैन सदा...

Mon, 03 Oct 2016 11:17 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
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अलम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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 मजहब-ए-इस्लाम और इंसानियत की खातिर पैगंबर-ए-इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने अपने साथियों के साथ करबला में शहादत दी। उन्हीं की याद में मोहर्रम की पहली तारीख यानी सोमवार को अलम और चौकियों का जुलूस निकाला गया। इमामबाड़ा से शुरू हुआ जुलूस प्रमुख मार्गों से होता हुआ देर रात वापस इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ। 
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सोमवार को अलमों को निकालने वाले अली का लश्कर या हुसैन जैसे नारे लगा रहे थे। इमामबाड़ा से शुरू हुआ अलम और चौकियों का गश्त बड़े चौराहे पर पहुंचा। यहां युवकों ने अखाड़ा किया और हैरतअंगेज करतबों का प्रदर्शन किया। जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ देर रात वापस  इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ। जुलूस में शामिल कई लोग इमाम हुसैन की याद में मातम करते नजर आए। बैंडों पर कलाकार मातमी धुन बजाते नजर आए। वहीं देर शाम इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। भोगांव में पैगंबर-ए-इस्लाम के दीन की हिफाजत के लिए शहादत देने वाले उनके नवासे हजरत इमाम हुसैन की याद में मनाए जाने वाले रंजोगम के मोहर्रम की पहली तारीख को नगर के प्रमुख मार्गों से होकर अलमों को जुलूस निकाला गया। जुलूस के आगे मरर्सिय पढ़ते हुए मुस्लिम समाज के लोगों ने गम का इजहार किया। जुलूस के आगे चल रहे अखाड़ों के खलीफाओं ने हैरतअंगेज करतब दिखाए।

इमामबाड़ा में ताजिया रखते ही शुरू हुई चहलपहल
मोहर्रम की पहली तारीख को शहर के इमामबाड़ा पर ताजियों को रख दिया है। ताजियों के रखते ही मुस्लिम इलाकों में चहलपहल शुरू हो गई। लोग देर रात तक फातिहा दिलाते नजर आए। बहुत से लोगों ने मन्नत मांगी और जिनकी पूरी हो गई, उन्होंने सोने-चांदी का पंजा, नीबू आदि चढ़ाया। कुछ ताजिये मोहर्रम की सात तारीख को रखे जाएंगे। 
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ताजियों को बनाने में जुटे कारीगर
करहल (ब्यूरो)। मोहर्रम पर निकाले जाने वाले ताजियों को बनाने के काम अंतिम चरण में है। करहल में कई मुस्लिम परिवार ताजिये बनाते हैं और उनके बनाए हुए ताजियों की मांग प्रदेश के अन्य जिलों में भी है।
मोहर्रम की नौवीं तारीख की रात और दसवीं तारीख को दिन में निकाले जाने वाले ताजियों की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बांस की लकड़ियों से बनाया जाने वाले ढांचे पर अबरीयुक्त कागज की महीन डिजाइन की जाती है। ताजिया कारीगर नूर आलम बताते हैं कि एक ताजिया बनाने में एक महीने से अधिक समय लग जाता है। इसके निर्माण में 8 से 10 हजार की लागत आती है। ताजिये की ऊंचाई करीब 12-13 फीट होती है। उनका कहना है कि  युवा पीढ़ी इस काम में खास रुचि नहीं ले रही है यह चिंता की बात है। मोहल्ला मदार दरवाजा के  अहसान इलाही, किला बजरिया के निसार मिस्त्री, गाड़ीवान के पप्पू रंगवाले आदि के घरों में भी ताजियों को बनाया जा रहा है। करहल में बने ताजिये उत्तर भारत के कई जिलों में जाते हैं। 
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