महोबा। ऑनलाइन गेम हो या मोबाइल पर चलती रील, किशोरों की उंगलियों तक सीमित नहीं रहीं इसका असर उनके दिमाग पर दिख रहा है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि सोशल मीडिया की बढ़ती लत किशोरों में विकृत प्रवृत्ति को जन्म दे रही है। तेज दृश्य, ऊंचा संगीत और कुछ सेकेंड में बदलती क्लिप्स किशोर के दिमाग में डोपामाइन का स्राव करती हैं। यही तात्कालिक सुख जब आदत बन जाती है तो वास्तविक जीवन की सामान्य स्थितियां उन्हें चिढ़ पैदा करने वाली लगने लगती हैं।
जिला अस्पताल में संचालित मन कक्ष के मनोचिकित्सीय परामर्शदाता प्रेमदास ने ओपीडी में आ रहे मामलों की जानकारी देते हुए बताया कि जब बच्चे ऑनलाइन गेम्स खेलते हैं या सोशल मीडिया पर रील्स देखते हैं तो उनके दिमाग में डोपामाइन हार्मोन का स्राव होता है। इससे तात्कालिक आनंद की अनुभूति होती है। इससे कुछ ही दिन में वह इसके लती हो जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि जब वह गेम्स या सोशल मीडिया से दूर होते हैं तो मन विचलित होने लगता है। इसकी वजह से वह फिर से गेम्स खेलने लगते हैं। ऐसे में यदि कोई रोकता या टोकता है तो वह आक्रामक हो जाते हैं। यहां तक कि आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
काउंसलिंग से सही रास्ते पर लाना संभव
महोबा। जिला अस्पताल की ओपीडी में ऐसे बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे बच्चों को काउंसलिंग अथवा समुचित उपचार से ही सही रास्ते पर लाया जा सकता है। नैदानिक मनोवैज्ञानिक डॉ. अंकिता गुप्ता कहती हैं कि स्क्रीन पर पलने वाली यह आदत यदि नहीं थमी तो इसके दुष्परिणाम स्कूल से लेकर समाज तक नजर आएंगे। इस संकेत पर भी अभिभावक नहीं संभले, तो देर हो जाएगी। काउंसलिंग व उचित सलाह से किशोर उम्र के बच्चों को सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया जा रहा है।