छह दशक से फुटपाथ पर और तीन पीढ़ियों से झुग्गी झोपड़ियों में
जिंदगी गुजार रहे इन आदिवासियों को आज भी अपने आशियानों की दरकार है। जिले
में कांशीराम कालोनियां बनाई गई, लेकिन इन गरीबों की पहुंच न होने के कारण
इन्हें अपात्र घोषित कर दिया गया। जिससे आज भी यह गरीब बारिश, तेज धूप और
सर्दी के मौसम में भी झोपड़ी में ही परिवार के साथ अपनी जिंदगी काटने को
मजबूर हैं।
मालूम हो कि जिला मुख्यालय में कोतवाली के सामने मेन रोड में ब्रिटिश हुकूमत के समय ही सूनसान स्थान पड़ा होने से आदिवासी तिरपाल लगाकर रहने लगे थे। आदिवासी दो जून की रोटी जुटाने के लिए सिल, पट्टा, उलसा बनाकर डोर टू डोर बेंचते हैं। इनका कारोबार छह पीड़ियों से चला आ रहा है। पुरुष पत्थर लाकर सिल पट्टा, उलसा बनाते हैं, वहीं इसके घर की महिलाएं घर-घर जाकर बिक्री करतीं हैं। साठ साल पहले अपने पूर्वजों के साथ आए बलराम, बंटा, बाबूलाल, मुन्नीलाल ने बताया कि सबसे पहले यहां हमारे बाबा एक काफिले के साथ आए थे, जो यही पर बस गए। इसके बाद पिताजी और चाचा लोग भी इन्हीं झुग्गी झोपड़ियों में रहकर परलोक सिधार गए, लेकिन आज तक हमारा परिवार तंग हाली के चलते अपना खुद का आशियाना तैयार नहीं कर सका , मजबूरन आज भी फुटपाथ पर रहकर हम लोग बच्चों का पालन पोषण कर रहे हैं। हमारे कई परिवारों के पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड और निवास प्रमाण पत्र नहीं हैं। इतना ही नहीं सरकार की नजर में यह झुग्गी झोपड़ी के बाशिंदे गरीब नहीं है, यही वजह है कि आज तक इन्हें बीपीएल सूची में शामिल नहीं किया गया। जिससे हम लोग वर्षों से यहां रहने के बाद भी बंजारों की तरह जिंदगी गुजार रहे हैं। बंटा ने बताया कि जब हमारे बाबा आए थे, उस समय यहां पर जंगल था और कोतवाली कई दशक बाद बनी।
आदिवासियों के जमीन पर भूमाफियाओं की नजर
कोतवाली रोड पर दोनों तरफ बड़ी बड़ी दुकानें खुल जाने के कारण अब भू माफियाओं की नजर आदिवासियों की जगह पर टिकी है। भूमाफिया इन आदिवासियों को कालोनियों में शिफ्ट कराकर बेशकीमती जमीन हथियाने की फिराक में हैं। यही वजह है कि आए दिन साठ साल से रह रहे इन आदिवासियों को यहां से हटाने के प्रयास किए जाते हैं। बेहद गरीबी से जूझ रहे आदिवासियों के बच्चे प्राइमरी शिक्षा के बाद अपने पुश्तैनी कार्य में अपने माता पिता का हाथ बटाने लगते है। आगे चलकर यही छोटे छोटे बच्चे सिल बट्टा, उलसा के कारीगर बन जाते हैं।
मिक्सी के आ जाने से खत्म हो गया सिल बट्टे का कारोबार
आधुनिक युग में मशीनरी के चलन में आ जाने से हाथ से किए जाने वाले काम धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। मिक्सी के आ जाने से अब लोग सिल बट्टे का इस्तेमाल कम करने लगे हैं। मिक्सी से ही मसाला पीसा जाता है, जिससे आदिवासियों का छह दशक पुराना सिल बट्टे का कारोबार मंदा हो गया है। जिसके चलते अब लोगों ने सिल बट्टे की खरीददारी कम कर दी है। घर- घर में मिक्सी आ जाने से हाथ से मसाला पीसने काम नाम मात्र का रह गया है।