घुघली। राम सबके लिए हैं, राक्षसों का नाश व धर्म की रक्षा के लिए उनका पृथ्वी पर अवतरण हुआ है। इसलिए हे! राजन राम को हमें दे दो जिससे संस्कृत की रक्षा हो सकें।
उक्त बातें हरखा प्यास में नौ दिवसीय राम कथा के चौथे दिन सोमवार को कथा वाचक राजन जी महाराज ने कहीं। उन्होंने कहा कि महर्षियों, साधु संन्यासियों द्वारा किए गए पूजा पाठ, वैदिक अनुष्ठान को लगातार बाधित करने वाले से बचने के लिए राक्षसों से बचने के लिए राम को अपने साथ लाने गए थे। राक्षसों द्वारा नष्ट किए जाने से आहत नाराज हो गए और दशरथ पर क्रोधित हो गए। उन्होंने ने कहा कि ही राजन राम आपके नहीं है वे जगत के पिता है। आप मेरी मांगी हुई वस्तु की प्रतिज्ञा करके अब तुम उसे तोड़ना चाहते हो। प्रतिज्ञा का त्याग रघुबंशियो के योग्य नहीं है। यह बरताव तो इस कुल के विनाश का सूचक है। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा व राक्षसों के नाश के लिए राम पृथ्वी पर अवतरित हुए है। महर्षि के आक्रोश को देखते हुए पूरा ब्रह्मांड शशंकित को गया की कहीं दशरथ का मोह राम को भटका न दें। इस पर दशरथ राजा को कुल गुरु वशिष्ठ ने बहुत समझाया। राजा से कुल गुरु ने कहा की ही राजन आप इच्छवकुवंशीय राजाओं के कुल में साक्षात दूसरे धर्म के समान उत्पन्न हुए हैं। आपको अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। कुल गुरु के इस बात को सुन व समझ कर राजा दशरथ समझ गए और विश्वामित्र से क्षमा मांग कर अपने प्रिय पुत्र राम व लक्ष्मण को महर्षि के साथ वन भेजने के लिए तैयार हो गए।