- विश्व रेडियो दिवस : युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा लोकल एफएम व पॉडकास्ट
- एक समय रही है मनोरंजन की सर्वाधिक निर्भरता
महराजगंज। आज से महज दो दशक पहले तक मनोरंजन का सबसे बड़ा संसाधन रहे रेडियो का दौर एक बार फिर युवाओं में एफएम और पाॅडकास्ट की बढ़ती लोकप्रियता के चलते बढ़ रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण कि इसके प्रयोग के लिए अलग से कोई समय नहीं निकालना पड़ता, बल्कि दूसरे कार्य में व्यस्त रहकर भी इसका लुत्फ उठाया जा सकता है।
90 के दशक में रेडियो का प्रसार गांव व गली तक बना हुआ था। इसके बारे में जानकारी देते हुए जिले के आईटीआई नोडल प्राचार्य मसूद इसरत कहते हैं कि तब रेडियो सुनने के लिए सबका अलग-अलग समय तय रहता था। दोपहर से शाम तक रेडियो महिलाओं व किशोरियों के कब्जे में रहता था, जो सुगम संगीत से लेकर भोजपुरी गानों को सुनते हुए घरेलू काम निपटाया करती थीं। इसके बाद युवक व किशोर इस पर कहानी-कविता जैसे मनोरंजक कार्यक्रम का प्रसारण सुनते थे।
रात्रि 8:30 बजे कड़क आवाज गूंजती कि ‘ये आकाशवाणी है’। फिर रेडियो घर के बड़े-बुजुर्गों के हवाले हो जाता जो देश दुनिया की खबरों से जुड़कर ज्ञान बढ़ाते। वर्ष 2001 के बाद रेडियो का उपयोग घटा और टीवी ने जगह हथियाने का प्रयास किया। इसका उपयोग जरूर घटा, लेकिन महत्व बना हुआ था, जो आज फिर आगे की तरफ कदम बढ़ा रहा। जिले में आज भी रिले बीबीसी के साथ रेडियो मंत्रा, बिग एफएम जैसे एफएम युवाओं की पसंद बने हुए हैं। पाॅडकास्ट जैसे प्रयोग व मोबाइल फोन पर इसकी उपलब्धता ने इसका दायरा फिर बढ़ाने का कार्य किया है। संवाद
जनपद में आज भी लगभग 75 फीसदी ग्रामीण अंचलों में रेडियो की उपलब्धता है। बदलाव के बाद भी इसके श्रोता जिले में 10 लाख से अधिक हैं। इस बार रेडियो दिवस की थीम जलवायु जागरूकता से जुड़ी है।
- प्रभाकर मणि त्रिपाठी, प्रभारी पर्यटन व सूचना अधिकारी