महराजगंज। बांसपार बैजौली बैदा टोला के संतबली की कहानी स्थानीय लोगों की जुबान पर है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का दावा करने वाले संतबली ने पेंशन और सरकारी सुविधाओं के लिए आवेदन तो कई बार किया लेकिन उनकी अर्जी स्वीकार नहीं की गई।
29 मई 2018 को उनका निधन हो गया। उनका परिवार अभी भी इस मांग के लिए संघर्षरत है। संतबली के पुत्र चुल्हाई का दावा है कि पिता ने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। वह 1941 और 1942 में अयोध्या जेल में बंद रहे। उन पर 25 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। उनके पास स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण पत्र तो था लेकिन पेंशन के लिए उनकी अर्जी कभी पूरी नहीं हुई। उन्होंने बताया कि पिता ने 1980 से पेंशन के लिए आवेदन देना शुरू किया। कई बार जांच-पड़ताल के लिए कागजात जमा किए लेकिन फाइलें धूल फांकती रहीं। मां मुराती देवी ने भी कई अर्जियां दीं लेकिन सुनवाई नहीं हुई। संतबली के निधन के बाद भी उनके परिवार ने यह लड़ाई जारी रखी लेकिन आज तक उन्हें पेंशन का लाभ नहीं मिला। संतबली का परिवार आज भी आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उनके पास मात्र 29 डिसमिल खेती की जमीन है। परिवार के पास शौचालय तो है, लेकिन मकान जर्जर हालत में है। गैस सिलिंडर जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। संतबली के पुत्र चुल्हाई ने बताया कि केवल पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पिता ने न केवल हिस्सा लिया बल्कि जेल की यातनाएं भी सहीं। उनकी कहानी उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाती है, जिन्हें आजादी के बाद भुला दिया गया। परिवार की स्थिति दयनीय है और किसी तरह की सरकारी सहायता भी नहीं मिल रही है।