महराजगंज। शहर से लेकर गांव तक मरीज माफिया का नेटवर्क फैला है। क्योंकि शुरुआती दौर से लेकर अस्पताल में भर्ती होने तक मरीजों की पल-पल की पूरी जानकारी रखते है। इतना ही नहीं गांव स्तर से जुड़े नेटवर्क की ओर से मरीज माफिया को व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से मरीज का पूरा डिटेल दिया जाता है।
सूत्रों की मानें तो नेटवर्क से जुड़े लोग मरीज के परिजनों को बेहतर ढंग से समझाकर अपने पक्ष में करते हैं। उसके बाद मरीज माफिया की ओर से बगैर डॉक्टर के संचालित बड़े-बड़े होर्डिंग बोर्ड और नामी गिरामी नर्सिंग होम में मरीज को भर्ती कराया जाता है। नर्सिंग होम में मरीजों के जान के साथ खिलवाड़ करते हुए मोटी रकम कमाते हैं। कई बार तो मरीजों को जान भी गंवानी पड़ जाती है।
सूत्रों के मुताबिक इन माफिया के संपर्क में कुछ स्वास्थ्य विभाग के कर्मी भी शामिल रहते हैं। सरकारी अस्पताल से रेफर मरीजों की सूचना इन तक पहुंचाने में मदद करते हैं। निचलौल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गेट के बाहर चाय की दुकान पर बैठे कुछ लोगों ने चर्चा के दौरान बताया कि मरीज माफियाओं का नेटवर्क काफी मजबूत है। क्योंकि मरीजों को घर से निकलने के बाद नर्सिंग होम तक पहुंचने में मदद करने वाले सभी सिंडिकेट का कमीशन तय होता है।
माफियाओं की ओर से कुछ का हिसाब सप्ताह में तो कुछ का 15 दिनों में किया जाता है। यहां तक कि माफियाओं के नेटवर्क से जुड़े सिंडिकेट का नर्सिंग होम के कर्मियों के साथ मरीज के परिजन की मौजूदगी में कोड भाषा भी रहता है। जहां पर मरीजों को दवा खरीदवाने में भी अच्छा कमीशन मिल जाता है।
सूत्र बताते हैं कि सरकारी अस्पताल में मरीज की हालत बिगड़ने पर डॉक्टर इलाज करने से हाथ खड़े कर देते हैं। इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के साथ रेफर कागज तैयार कर दिया जाता है। अधिकांश मामलों में गंभीर रोगियों को भर्ती भी नहीं किया जाता है। इसी तरह जिला महिला चिकित्सालय में प्रसूताओं के आने पर पहले अल्ट्रासाउंड एवं ब्लड जांच की रिपोर्ट देखी जाती है।
गर्भाशय में पानी की कमी, खून की कमी या हाई ब्लड प्रेशर होने पर मरीज को भर्ती न करके मेडिकल कॉलेज ले जाने की सलाह दे दी जाती है। इस स्थिति का मरीज माफिया पूरा लाभ उठाते हैं। निजी अस्पतालों में मरीज भेजते वक्त दलाल यही झांसा देते हैं कि आयुष्मान कार्ड पर तो सारा इलाज सरकारी खर्च से ही होता है, लेकिन जब मरीज अस्पताल में भर्ती हो जाता है तो कार्ड से केवल ऑपरेशन में लगे उपकरण और छोटे-छोटे अन्य खर्च कटते हैं।
इस दौरान डॉक्टर जो मेडिकल स्टोर से दवाएं लिखते हैं, उनका बिल तो देना ही पड़ता है। चार-पांच दिन बाद फिर लोग अपना मरीज लेकर सरकारी अस्पताल का चक्कर लगाते हैं।
बाहर से एंबुलेंस मंगाकर भेजे देते हैं निजी अस्पताल
इमरजेंसी वार्ड के आसपास किसी मरीज का तीमारदार बनकर घूमते दलाल गंभीर मरीजों के परिजनों को मददगार बनकर झांसे में लेते हैं और तुरंत ही बाहर से एंबुलेंस मंगाकर निजी अस्पताल भेज देते हैं। तीन-चार दिन में सारा पैसा गंवाने के बाद मरीज को गंभीर हालत में ही छोड़ देते हैं। तीमारदार भी पूरी रकम गंवाने के बाद समझ जाता है कि उसके साथ धोखा हो रहा है।