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Maharajganj News: इंजन नहीं लक्ष्मीपुर की विरासत ले गए अधिकारी

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सौ वर्ष पुराने विरासत के खोने के गम ने झकझोर कर रख दिया, सौ वर्ष पुराने विरासत के अलगाव ने किया गमगीन
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ट्राम-वे रेल परियोजना का इंजन जाने से दुःखी ग्रामीण, एक मात्र ट्रॉम वे रेल इंजन को संरक्षित करने की कर रहे मांग
एक सप्ताह पहले ट्रॉम वे रेल का इंजन लेने पहुंचे अधिकारियों को ग्रामीणों के विरोध के बाद लौटना पड़ा था खाली हाथ
लक्ष्मीपुर। सोमवार को लक्ष्मीपुर के एकमा डिपो से रेलवे अधिकारियों की टीम देश की पहली ट्रॉम वे रेल परियोजना के दो इंजन लखनऊ लेकर चली गई। कुछ दिनों पहले स्थानीय लोगों के भारी विरोध के कारण टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा था। स्थानीय लोग इंजन को यहीं पर संरक्षित करने की मांग कर रहे थे। चार में से तीन इंजन लखनऊ भेजे जाने से स्थानीय लोग दुखी हैं। अपने विरासत से दूर होने का दुख स्थानीय लोगों के चेहरों पर साफ तौर पर दिख रहा है।
महराजगंज सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग की वन संपदा को देश के महानगरों तक पहुंचाने के लिए वर्ष 1924 में लक्ष्मीपुर के एकमा डिपो में स्थापित देश की पहली ट्राम-वे रेल परियोजना के दो इंजन जाने से स्थानीय लोग गमगीन हैं। ट्रॉम वे रेल परियोजना को स्थापित करने पर तत्कालीन समय में 3,51,243 रुपये खर्च किए गए थे। लक्ष्मीपुर रेंज और उत्तरी चौक रेंज के जंगल में 22.4 किमी दूरी तक रेल लाइन बिछाई गई थी। निरंतर 55 वर्षों की सेवा कर के आठ लाख रुपये घाटे के बाद 1982 में ट्रॉम-वे रेल परियोजना को बंद कर दिया गया।
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डिपो में प्रत्येक 40 अश्व शक्ति के 4 इंजन, 26 बोगियां व सैलून, 2 निरीक्षण ट्राली सहित तमाम उपकरण एकमा डिपो में सुरक्षित रख दिए गए थे लेकिन वर्ष 2009 में तत्कालीन वनमंत्री फतेहपुर बहादुर सिंह के निर्देश पर एक इंजन, एक सैलून एवं एक बोगी को लखनऊ चिड़ियाघर में रखवा दिया गया था। इसके बाद स्थानीय लोगों ने बचे हुए शेष इंजन व उपकरणों को यहीं पर संरक्षित कर म्यूजिक बनाने की मांग करने लगे। 23 फरवरी 2026 में शासन के निर्देश पर लक्ष्मीपुर से ट्रॉम वे रेल के दो इंजनों को रेल अधिकारी लखनऊ ले कर चले गए। लोगों का कहना है कि अब मात्र एक ऐतिहासिक इंजन लक्ष्मीपुर बचा है। सभी की मांग है कि इस इंजन को यहीं पर संरक्षित किया जाए।
एक ट्राम-वे को धरोहर के रूप में संरक्षित करने की मांग

ट्रॉम वे रेल परियोजना के सेवानिवृत्त कर्मचारी मोहन कन्नौजिया (98) ने जब ट्रॉम वे रेल की बात की गई तो उनकी आंखें भर गईं। उन्होंने कांपते होठों से बताया कि 1948 में उन्होंने ट्रॉम वे रेल परियोजना में ज्वाइनिंग की। 1974 में स्थाई कर्मचारी हो गए। वह वर्तमान में पेंशन पाते हैं। उनके सामने से जब रेल इंजन जा रहा था तो उनका हृदय रो रहा था। वह इससे बहुत आहत हैं। उन्होंने कहा कि सरकार से यही गुजारिश है कि जो एक इंजन लक्ष्मीपुर में है उसे अब कहीं न भेजा जाए। अब इसी जगह पर इसे म्यूजियम बना कर धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।
पर्यटकों को लिए संचालित की जाए एक मात्र ट्रॉम वे

देवदह रामग्राम बौद्ध विकास समिति के अध्यक्ष जितेंद्र राव ने गमगीन मन से शासन प्रशासन से अपनी मांग दोहराते हुए कहा कि महराजगंज की विरासत बचाने के लिए ट्रॉम वे रेल के इंजन को संचालित कर जंगल पर्यटकों के लिए चलाया जाए। जंगल के किनारे कुछ ही दूरी पर गौतम बुद्ध का ननिहाल देवदह है और चौक बाजार के पास ऐतिहासिक बौद्ध स्तूप रामग्राम है। जहां पर्यटकों का आवागमन लगा रहता है। देवदह और रामग्राम से जोड़ते हुए ट्रॉम वे रेल का पुनः संचालन होने से जनपद में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

उम्मीदों की टूट गई डोर

लक्ष्मीपुर एकमा के ग्राम प्रधान सरदार तजेंद्रपाल सिंह उर्फ गोल्डी सिंह ने बताया कि ट्रॉम वे रेल इंजन केवल एक मशीन नहीं थी। यह हमारे पूर्वजों की मेहनत, हमारे इतिहास की गवाही और हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसे ले जाते देखना बेहद पीड़ादायक पल था। कई ग्रामीणों ने वर्ष 2009 की घटना को भी याद किया, जब एक इंजन और सैलून को लखनऊ भेजा गया था। तब उन्हें आश्वासन मिला था कि बाकी धरोहर यहीं रहेंगी। अब दो और इंजन चले जाने से लोगों को लगता है कि उनकी उम्मीदों की डोर टूट गई है।


विरासत को सहेजना जरूरी

लक्ष्मीपुर एकमा की पूर्व ग्राम प्रधान सोनी कन्नौजिया का कहना है कि विरासत को सहेजना जरूरी होता है। अगर यह इंजन यहीं रहता तो हमारे बच्चे और आने वाली पीढ़ियां जान पातीं कि हमारा इलाका कितना समृद्ध इतिहास रखता है। जब इंजन रवाना हुए तो कुछ देर तक वहां खड़े लोग बस धूल उड़ते देखते रहे। ट्रक दूर जाते रहे और पीछे छूटता गया एक सदी पुराना अध्याय। एकमा डिपो का वह हिस्सा अब खाली-खाली लगता है। जहां कभी इतिहास सांस लेता था, वहां अब सन्नाटा पसरा है। उनकी मांग है कि बचे हुए एक इंजन को यहीं पर संरक्षित किया जाए।
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आज स्थानीय लोगों की एक ही मांग है जो अंतिम इंजन लक्ष्मीपुर में बचा है, उसे किसी भी हालत में यहां से न हटाया जाए। उसे संरक्षित कर संग्रहालय या हेरिटेज स्थल का रूप दिया जाए। ताकि यह क्षेत्र अपनी पहचान से वंचित न हो। लक्ष्मीपुर की जनता का दर्द केवल भावनात्मक नहीं बल्कि सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा है। वे चाहते हैं कि उनके अतीत का यह प्रतीक सुरक्षित रहे। क्योंकि विरासत केवल पत्थर, लोहे या ईंटों का ढांचा नहीं होती, वह स्मृतियों का घर होती है, आत्मगौरव की नींव होती है। आज लक्ष्मीपुर के लोगों की आंखों में एक ही सवाल है क्या हमारी धरोहर का अंतिम प्रतीक बचा रहेगा?
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