महराजगंज। चीनी मांझा से पतंगबाजी का शौक कई जगह दुर्घटनाओं का कारण बनने के बाद इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
हाल ही मुख्यमंत्री ने चीनी मांझा से मौत पर आरोपी के खिलाफ हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि जनपद में चीनी मांझा का क्रेज नहीं है। यहां केवल बरेली के मांझा का इस्तेमाल किया जाता है।
नेपाल से सटा भारतीय जिला होने के बाद भी जनपद के पतंगबाजों में चीनी मांझा का क्रेज कभी नहीं रहा। शायद वजह भी यही है कि कारोबारी चीनी मांझा लाने के प्रयास में कभी नहीं फंसे। कारोबारियों के मुताबिक यहां सिर्फ लायन ब्रांड के मांझा का क्रेज जो बरेली तैयार होता। इसकी खास बात यह कि यह काटन सद्दी को एक झटके में काट गिराती, लेकिन उंगलियों को नुकसान ( कटने छिलने) जैसी समस्या नहीं उत्पन्न करता।
प्रदेश में चाइनीज मांझे के खिलाफ पुलिस ने छापेमारी शुरू की है। लेकिन पड़ोसी राष्ट्र से सटा भारतीय जनपद होने के बाद भी यहां चीनी मांझा की डिमांड न होने से कारोबारियों को इसे मंगाने की जरूरत नहीं पड़ती। मऊ पाकड़ व मुख्यालय के मंजूर पतंग कारोबार से लगभग डेढ़ दशक से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि पहले कागज के पतंग आते थे लेकिन अब हल्के प्लास्टिक शीट का चलन अधिक है। पांच रुपए से 20 रुपये तक की पतंग उनके बिकती। काटन की सद्दी (धागा) व चरखी लखनऊ से तो मांझा लायन ब्रांड का वर्षों से बरेली से मंगाया जाता है। इस मांझे की खासियत है कि यह सिर्फ धागे पर सख्त है। इसके उपयोग से उंगलियों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है। फरेंदा में श्यामू ब्रम्हचारी और मिथिलेश वर्मा पिछले 10 वर्ष से पतंग बिक्री कारोबार से जुड़े हैं। दोनों ने बताया कि जिले में चायनीज मांझा की कोई डिमांड नहीं है। हम लोग बरेली का लायन ब्रांड माझा ही मंगाते हैं। पतंग की सर्वाधिक बिक्री मकर संक्रांति व गर्मियों में होती है।