नौतनवा। अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज आठ किलोमीटर की दूरी पर नौतनवा में स्थापित झारखंडी मंदिर भारत-नेपाल के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। हिमालय की तलहटी में बसे इस शिवालय का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना है।
मंदिर की मान्यता को देखते हुए अन्य दिनों की अपेक्षा सावन माह में जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ उमड़ती है। सच्चे मन से मांगी गई मुराद बाबा अवश्य पूरी करते हैं। मंदिर के पुजारी जयप्रकाश गिरी बताते हैं कि 250 वर्ष पूर्व आसपास का पूरा इलाका घने जंगल से घिरा था। बासदेव गोसाई नामक एक व्यक्ति घोड़े से भ्रमण पर निकले थे, तभी उन्हें धरती से पिंडी रूप में एक शिवलिंग ने प्रकट होकर दर्शन दिया था। इसके बाद उन्होंने उक्त शिवलिंग का पूजन-अर्चन शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह बात उनके परिवार और फिर अन्य श्रद्धालुओं तक पहुंची और लोग वहां दर्शन के लिए आने लगे।
मंदिर परिसर में मौजूद करीब 400 वर्ष पुराना बरगद का पेड़ इस बात की पुष्टि करने को काफी है कि मंदिर एक ऐतिहासिक स्थल है। वक्त के साथ आज यह मंदिर नगर के अलावा आसपास के जनपदों एवं पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में भी विख्यात है, जहां सावन में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है।