महराजगंज। सर्दी बढ़ने के साथ ही कफ सीरप की बिक्री बढ़ गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में खपत ज्यादा हो रही है। जानकारों का कहना है कि खांसी के मरीजों से ज्यादा कफ सीरप का सेवन नशेड़ी कर रहे हैं। इन दिनों प्रत्येक माह करीब एक करोड़ का धंधा हो गया है।
सिसवा, निचलौल, रेगहिया, ठूठीबारी, बरगदवा, झुलनीपुर समेत अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में खपत ज्यादा हो रही है। बताया जा रहा है कि नेपाली नशे की सस्ती डोज लेने के लिए सरहद पार आसानी से आ जाते हैं और दुकानों से कोडिनयुक्त कफ सीरप की दो से तीन शीशी एक बार में ही गटक कर चले जाते हैं।
इसमें कोई खतरा भी नहीं रहता है। पकड़े जाने का डर भी नहीं रहता है। धंधेबाज ज्यादातर गैर लाइसेंसी हैं। वे कोडीनयुक्त कफ सीरप सुरक्षित स्थानों पर रखते हैं। मांग के अनुसार इसे मुहैया कराते हैं। एक कफ सीरप 100 एमएल 130 से 150 रुपये के बीच मिलती है।
दवा कारोबारी के अनुसार, सीरप की एक शीशी पर करीब 15 से 20 रुपये तक मुनाफा होने से मेडिकल स्टोर पर प्रचुर मात्रा में कफ सीरप उपलब्ध है।
कोरेक्स, कोरेक्स-डी, बेनाड्रिल, फेंसाड्रिल, कफेक्स, एस्कोरिल आदि में अल्प मात्रा में एल्कोहल या कोडिन होता है। कोडिन अफीम के पौधे में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पदार्थ है, जिसे आसवन विधि से निकाला जाता है।
यह बेहतर दर्द निवारक है और इसके प्रयोग से मांसपेशियों को आराम मिलता है। इसी वजह से नशेड़ी कफ सीरप का सेवन करते हैं।
बिक्री और मुनाफा अधिक होने की वजह से नई-नई दवा कंपनियां भी इस क्षेत्र में हाथ आजमा रही हैं। बाजार में अलग-अलग नाम व डिजाइन से इतने प्रकार के कफ सीरप मौजूद हैं कि उनका नाम याद रखना मुश्किल है।
हालांकि, कोडिन युक्त कफ सीरप की बिक्री का रिकाॅर्ड रखना अनिवार्य है, लेकिन ऐसा बहुत कम हो रहा है। बाजार में अधिकतर कफ सीरप ऐसे बिक रहे हैं, जिस पर कोडिन का जिक्र ही नहीं है।