निचलौल। सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग अंतर्गत मधवलिया वन रेंज के जंगल में लेपर्ड (तेंदुआ) रेस्क्यू सेंटर का निर्माण कार्य कछुए की गति से कराया जा रहा है। यही कारण है कि अभी तक रेस्क्यू सेंटर के पहले चरण का सौ फीसदी कार्य पूरा नहीं हो सका है। वन विभाग के मुताबिक पहले चरण का अभी तक लगभग 10 फीसदी कार्य अधूरा है।
जिम्मेदारों के मुताबिक फरवरी में ही मानक के अनुसार पहले चरण का सौ फीसदी कार्य पूरा करने का दावा किया जा रहा था। लेकिन जिम्मेदार दावों पर खरा नहीं उतर सके। हालांकि पहले चरण के अधूरे कार्य को जिम्मेदार जल्द पूरा करने के लिए प्रयास करने में जुटे हैं।
मधवलिया वन रेंज के जंगल में करीब 22 हजार स्क्वायर मीटर में 4.99 करोड़ रुपये की लागत से लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर बनाने की स्वीकृति वर्ष 2022 में ही मिल गई थी। इसके बाद केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सेंट्रल जू अथॉरिटी) ने इसके निर्माण के लिए हरी झंडी दे दी। वहीं 10 अप्रैल 2023 को मुख्यमंत्री ने रेस्क्यू सेंटर का शिलान्यास करते हुए शीघ्र काम शुरू कराने के लिए निर्देश दिए थे। लेकिन जिम्मेदारों की मनमानी के चलते लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर का जल्द निर्माण होने की सपना अधूरा रह गया है।
मधवलिया वन क्षेत्राधिकारी अजीत कुमार ने कहा कि सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग के जंगल पड़ोसी देश नेपाल के अंतरराष्ट्रीय चितवन नेशनल पार्क और बिहार के वाल्मीकि नगर टाइगर रिजर्व के जंगलों से सटा है। यह प्रभाग वन संपदा व वन्यजीव दोनों ही रूप से काफी विकसित है। शासन की तरफ से प्रदेश में बढ़ते मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं को देखते हुए पिछले वर्ष सोहगीबरवा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के मधवलिया वन रेंज में रेस्क्यू सेंटर खोलने का निर्णय लिया गया था। चार चरणों में निर्माण कार्य पूरा करना है। पहले चरण में शासन की तरफ से जारी 4.99 करोड़ रुपये की रकम खर्च कर पांच तेंदुए या टाइगर के संरक्षण के साथ ही अन्य स्थान का निर्माण कार्य लगभग 90 फीसदी पूरा करा लिया गया है। पहले चरण का निर्माण होने के बाद दूसरे चरण में डॉक्टरों के रहने के लिए आवास सहित अन्य भवनों का निर्माण कार्य कराया जाएगा। लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर का निर्माण कार्य देखदेख में कराया जा रहा है।
घायल तेदुओं को इलाज के लिए भेजना पड़ता बाहर
वन विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, सोहगीबरवा सेंचुरी क्षेत्र में तेंदुआ समेत अन्य वन्य जीवों की काफी उपलब्धता है। क्योंकि यह समृद्ध जंगल के रूप में जाना जाता है। फिलहाल जरूरत व्यवस्थाओं के अभाव में आए दिन यहां मानव व वन्य जीव में संघर्ष होना आम बात है। ऐसे में कई बार जंगलों से बाहर निकलने वाले तेंदुए भी घायल हो जाते हैं। उनकी समुचित देखभाल स्थानीय स्तर पर नहीं हो पाती है। ऐसे में कभी-कभार घायल हुए तेंदुए को इलाज के लिए दूर भेजना पड़ता है।