महराजगंज। गौतम बुद्ध के ननिहाल देवदह की संरक्षित जमीन के सीमांकन से क्षेत्र के किसान नाराज हो गए हैं। देवदह के कुछ हिस्से में कई साल काबिज आसपास के गांवों के किसान सीमांकन के कारण शनिवार को उग्र हो गए। उग्र किसानों ने सीमांकन के दौरान लगाए पत्थरों को उखाड़ कर फेंक दिया और सीमांकन के लिए लगे निशान मिटा दिया। सीमांकन के दौरान लगाए गए निशान मिटाए जाने का वहां मौजूद कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने विरोध किया तो किसानों ने उन्हें दौड़ा लिया। इससे बौद्ध भिक्षु वहां से भाग निकले।
वर्ष 1978 में देवदह की खुदाई के साथ ही पुरातत्व विभाग ने करीब 88 एकड़ जमीन को संरक्षित कर लिया था। पिछले कुछ वर्षों से बौद्ध भिक्षुओं की ओर से हर वर्ष अक्टूबर माह में यहां बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। इस बीच ेवदह के विकास के उद्देश्य से बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट योजना के तहत करीब 24 लाख रुपये शासन ने संरक्षित जमीन के चारों तरफ तारबाड़ के लिए स्वीकृत कर दिया। जो किसानों के लिए मुसीबत बन गया। तारबाड़ के लिए डीएम ने पुरातत्व विभाग से एनओसी मांगी। इसके बाद पुरातत्व विभाग ने वर्ष 1978 में कागजों में संरक्षित जमीन का सीमांकन शुरू कर दिया। जबकि इसके कुछ हिस्से पर कई वर्ष से कई किसान काबिज रहे हैं और खेती भी करते आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि करीब 80 एकड़ उस जमीन का भी सीमांकन किया गया, जिस पर कई साल से किसान काबिज रहे हैं। काबिज जमीन का सीमांकन से नाराज किसान शनिवार को उग्र हो गए। किसानों ने पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की देखरेख में राजस्व टीम की तरफ से किए गए सीमांकन व मौके पर निशान के तौर पर लगाए गए पत्थरों को हटा दिया। निशान मिटाने का मौके पर मौजूद कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने विरोध करने की कोशिश की तो उग्र किसानों ने उन्हें दौड़ा दिया। किसानों को उग्र देख बौद्ध भिक्षु वहां से भाग गए। किसानों का कहना था कि जिस जमीन का सीमांकन किया गया है, वह उनकी जमीन है। उस जमीन पर वह अपना कब्जा नहीं हटाएंगे।