सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के पीछे लखनऊ के एक गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी की मजबूत पहल रही।
अगस्त 2003 में लोक प्रहरी की स्थापना चुनाव आयोग के पूर्व मुख्य आयुक्त और गुजरात के गवर्नर रहे आरके त्रिवेदी की रहनुमाई में हुई।
कई बड़े लोगों ने की थी पहल
गुड गवर्नेंस के मूल उद्देश्य को हासिल करने के लिए संघर्ष के लिए बनी इस संस्था के संरक्षक हैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश एसएन सहाय और प्रदेश के पूर्व डीजीपी जेएन चतुर्वेदी।
पढ़े: दो साल की सजा तो जनप्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म
लोक प्रहरी के सचिव और पूर्व आईएएस एसएन शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है।
2005 में दाखिल की थी याचिका
उन्होंने कहा कि लोक प्रहरी की ओर से हमने 2005 में इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। उसी साल लिली थॉमस की ओर से भी इस संबंध में एक और याचिका दाखिल हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही याचिकाओं के आधार पर यह ऐतिहासिक फैसला दिया है।
छह दशक बाद बदलाव हुआ मुमकिन
शुक्ला कहते हैं, इस फैसले की वजह से 1951 से चले आ रहे जनप्रतिनिधित्व कानून में एक बड़ा बदलाव संभव हुआ है। सबसे बड़ी अदालत ने इस जन प्रतिनिधित्व कानून की एक धारा को निरस्त कर आपराधिक चरित्र के लोगों के लिए सियासत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
पढ़े: दिग्गजों पर भी लटकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तलवार
इसी धारा का इस्तेमाल कर दागी चरित्र के राजनेता अदालत में दोषसिद्ध साबित होने के बावजूद सत्ता में बने रहते थे, लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं होगा।
हुई थी पुरजोर कोशिश
लोक प्रहरी की ओर से अदालत में इस बात की जोरदार दलील दी गई कि जिस आधार पर हम किसी को चुनाव लड़ने से रोक सकते हैं, उसी आधार पर उसकी सदस्यता कैसे जारी रह सकती है।
सभी पहलुओं पर गौर करके दिया फैसला
अदालत का फैसला आने के बाद भी किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को कैसे व्यवस्था का हिस्सा बने रहने दिया जाए और उसे प्रशासन और अफसरों पर हुक्मवदूली का अधिकार दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पहलुओं पर गौर कर इस बारे में विस्तार से फैसला दिया है।