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अद्भुत है भगवान नीलकंठेश्वर की त्रिमुखी प्रतिमा -

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श्रंगार में भगवान शिव - फोटो : LALITPUR
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पाली। बुंदेली वसुंधरा की कोख में विंध्यांचल पर्वत की सुरम्य वादियों में आस्था के केंद्र बिंदु भगवान श्री नीलकंठेश्वर अपने गर्भ में हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति व सभ्यता की कहानी समेटे हैं। यह पीठ ज्योतिष और तांत्रिक साधकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर में विराजमान भूतभावन भगवान शिवजी की त्रिमुखी प्रतिमा का निर्माण नौवीं शताब्दी में चंदेल कालीन राजाओं के द्वारा कराया गया था।
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मंदिर की इसकी वास्तु शिल्प देखते ही बनती है। मंदिर को जाने के लिए सौ से ज्यादा सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है। गर्भ गृह में प्रवेश के साथ ही काले बलुए पत्थर पर भगवान शिव के त्रिमुखी दर्शन होते हैं। नीचे फर्श पर एकमुखी ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यहां भगवान के अर्ध नारीश्वर स्वरूप के दर्शन होते हैं। एकमुखी ज्योतिर्लिंग का हिंदू वेद पुराणों में बड़ा महत्व है। महाशिवरात्रि पर मंदिर में भगवान भोलेनाथ और राजा हिमांचल की पुत्री गौरा का विवाह धार्मिक अनुष्ठानों के बीच बुंदेली परंपरा के साथ संपन्न होता है। राजा हिमांचल एवं रानी मैना के चयनित पात्र अपनी पुत्री गौरा का कन्यादान लेंगे।
विवाह में शिव पक्ष एवं गौरा पक्ष से जुड़ी महिलाएं बुंदेली विवाह गारी गीत के माध्यम से भक्ति के साथ हास्य के भाव प्रस्तुत करेंगी। दोनों ही पक्ष अपने गीत ‘कैसे हो समधी अनबने...’, न घोड़े न हाथी पैदल आए बराती..’, ‘आज मोरी गौरा को चढ़त है चढ़ाओ..’, ‘भोले सांसी तो बताओ कीने के दइ करवायो व्यायो...’, ‘समर-समर पग धरो बेटी राजन की..’ आदि गीतों के बीच वैवाहिक नोकझोंक होती है। देर शाम से चलने वाले इस कार्यक्रम को वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच संपन्न कराया जाता है। इसमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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महाशिवरात्रि को लेकर भगवान भोलेनाथ का भव्य श्रृंगार किया जाता है। श्रृंगार में ऐसे लगता है कि जैसे साक्षात भोलेनाथ के दर्शन हो रहे हों।
श्री नीलकंठेश्वर मंदिर में बुंदेली दर्ज पर शिव-पार्वती का विवाह संपन्न कराया जाता है। इस दिन माता पार्वती का कन्यादान कर पुण्य अर्जित किया जाता है। वर्षों से इस परंपरा को देखता आ रहा हूं। युवा वर्ग भी इसमें भाग लें, जिससे ऐसे कार्यों में उत्साह पैदा हो।
- गोविंददास चौरसिया
महाशिवरात्रि पर्व पर यहां विवाह देखने परिवार सहित आता हूं। जो अपने आप में बड़ा सौभाग्य होता है। विवाह की रस्मों में उपस्थित रहने से मन बड़ा ही आनंदित होता है।
- नरसिंह चौरसिया
यहां भगवान के बड़े ही अलौकिक दर्शन हैं । मंदिर के विकास की प्रबंधन व्यवस्थाएं ठीक नहीं हैं, जिससे अब तक जो विकास यहां होना था वह नहीं हो पाया। एक प्रबंधन कमेटी होनी चाहिए, जो महाशिवरात्रि पर्व पर यहां होने वाले कार्यक्रम को और ऊपर तक ले जाए ।
- अजय यादव, बंट
भले ही समाज के लोगों ने विवाह के रूवरूप बदल दिए हों, लेकिन यहां शिव- पार्वती विवाह पूरे रीति- रिवाजों से होता आ रहा है। हिंदू रीति- रिवाजों से होने वाले विवाहों की अपनी अलग मिठास है। लोगों से चाहूंगा कि इन रीति- रिवाजों का अच्छी तरह पालन करें।
- हरचरन चौरसिया
अब विवाहों में फिल्मी गानों का प्रचलन बढ़ गया है। पुराने वैवाहिक गीत मंडपों से गायब हो गए हैं। महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ के विवाह में आज भी रस्मों के बीच मंगलगायन करने का मौका मिलता है। वास्तव में ऐसे लगता है कि हम ही पार्वतीजी को शिवजी के साथ विदा कर रहे हैं।
- सिंबा कुशवाहा
21 को होगा भगवान शिव और पार्वती का विवाह
महाशिवरात्रि पर 21 फरवरी को भूतनाथ भगवान श्री नीलकंठेश्वर धाम मंदिर में आस्था की बयार के बीच हर्षोल्लास से राजा हिमांचल एवं रानी मैना की पुत्री पार्वती का विवाह भगवान शिवजी के साथ होगा। देर शाम को होने वाले इस कार्यक्रम में हल्दी, मंडप सहित अन्य वैवाहिक रस्में बुंदेली रीति रिवाजों से संपन्न होंगी। वहीं, भोलेनाथ के दरबार में हाजरी लगाने वाले लोग बेलपत्ती, धतूरा, फल, फूल भगवान को अर्पित करके दूध, दही, घी, गुड़, शहद और पानी से भगवान का रुद्राभिषेक करेंगे।

भगवान श्रीनीलकंठेश्वर का दिव्य स्वरूप- फोटो : LALITPUR

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