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Lalitpur News: आधुनिकता की चकाचौंध में खो गया सैरा नृत्य और आल्हा गायन

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बिरधा (ललितपुर)। सावन माह में बुंदेलखंड की प्राचीन परंपराएं जैसे सैरा नृत्य, सावन गीत और आल्हा गायन धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। पहले मंदिर परिसर और चौराहों पर बुजुर्ग गाजे-बाजे के साथ सावन गीत गाकर सैरा नृत्य करते थे, जबकि घरों के बरामदों में बुजुर्ग और युवा आल्हा गायन करते थे। लेकिन, आज ये परंपराएं आधुनिकता की चकाचौंध में इतिहास में सिमटती जा रही हैं। अब न तो पेड़ों पर झूले नजर आते हैं और न ही महिलाएं सावन गीत गाती हैं। बच्चे, युवा और महिलाएं अब मोबाइल पर मनोरंजन कर रहे हैं।
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बुंदेलखंड का प्रमुख लोक नृत्य सैरा है। बुजुर्ग बताते हैं कि जब पांडव अज्ञातवास के दौरान जंगल में सहरिया (आदिवासी) समुदाय के संपर्क में आए, तब सहरिया लोगों ने उनके सम्मान में सैरा लोक नृत्य किया था। इस नृत्य में नर्तक-नर्तकियां वृत्ताकार घेरे में एक हाथ में डंडा और दूसरे में मयूर पंख लेकर कदमताल और डंडों की गड़गड़ाहट के साथ मयूर पंख को हवा में लहराते हुए विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हैं। सावन माह शुरू होते ही अच्छी बारिश की कामना के साथ भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में कृषक उत्साहपूर्वक सैरा नृत्य करते थे, जो श्रावण से जन्माष्टमी तक चलता था। लेकिन, यह परंपरा अब लगभग लुप्त हो चुकी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पहले घरों के बरामदों में बुजुर्ग और युवा बैठकर आल्हा गायन करते थे, जिसमें महोबा के आल्हा-ऊदल की कहानियां होती थीं। जब कई दिनों तक लगातार बारिश होती थी, तब आल्हा गायन दिन-रात चलता था, जो लोगों को उनकी परंपराओं और पूर्वजों की कहानियों से जोड़ता था। आल्हा के माध्यम से बुंदेलखंड की पौराणिक कहानियां सीखने को मिलती थीं, लेकिन अब यह परंपरा केवल कुछ वृद्ध लोगों तक सिमट गई है। पहले सावन मास शुरू होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर के सामने आम के पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते थे, जिन पर बच्चे झूलकर आनंद लेते थे। लेकिन, समय के साथ यह परंपरा भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
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वर्तमान समय में सैरा लोक नृत्य विलुप्त होने के कगार पर है। नई पीढ़ी के युवक-युवतियां अपनी संस्कृति के प्रति रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इसे बचाने के लिए नई पीढ़ी को प्रेरित करने की जरूरत है। हमने इस नृत्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया है।

- जितेंद्र कुमार, बुंदेली सम्राट लोक कला संस्था, बिरधा

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पहले सावन मास शुरू होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में हर चौराहे या मंदिर पर सैरा नृत्य किया जाता था, जिसमें लोग डंडा लेकर नृत्य करते थे। लेकिन, यह परंपरा अब पूरी तरह लुप्त हो रही है।

- दलू रजक, बुजुर्ग, बिरधा

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पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बरामदों में कई लोग एक साथ बैठकर आल्हा गायन करते थे। एक-दो लोग गाते और बाकी लोग सुनकर आनंद लेते थे। लेकिन, अब आल्हा गायन लगभग लुप्त हो चुका है। आल्हा की किताबों में बुंदेलखंड की परंपराएं और संस्कृति छिपी हैं।

- फूलचंद अहिरवार, पिपरिया डोंगरा

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पहले ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर के सामने पेड़ों पर झूले डाले जाते थे, जिन पर बच्चे झूलते थे। महिलाएं और बेटियां सावन गीत गाकर झूला झूलती थीं। लेकिन, अब यह परंपरा भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
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- शिवदास कुशवाहा, बिरधा
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