पाली (ललितपुर)। होठों की लाली, पाली का पान के नाम से मशहूर पान कभी मौसम की मार तो कभी रोगों के प्रकोप से किसानों के लिए घाटे की खेती बनता जा रहा है, जिससे पान किसान घाटे का सौदा मानकर तौबा कर पलायन कर रहे हैं। जो खेती में लगे हैं, उनके काम करने का तरीका आज भी वर्षों पुराना है।
यहां का पान प्रशिक्षण केंद्र भी कोई उपयोगी जानकारी और लाभ नहीं मिल पाने से बुंदेलखंड के किसानों के लिए सफेद हाथी साबित हो रहा है।
बुंदेलखंड के पाली में पान की खेती का काफी पुराना इतिहास है। यहां का पान सहारनपुर, दिल्ली, बरेली में ही नहीं, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत अन्य दूसरे देशों में जाता है, लेकिन मौसम की बेरुखी व रोगों के प्रकोप से पान किसानों के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। गुटखों के बढ़ते चलन के कारण भी पान के शौकीनों की संख्या घट गई है।
घाटे का सौदा देख बड़ी संख्या में पान किसान घरों पर ताला लगाकर अपने परिवार के साथ पाली से पलायन कर गए, जो खेती करने में लगे हैं उनके सामने भी मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।
खेती को बनाए गए बरेजों में सिंचाई के लिए पानी का अभाव व पान में लगने वाले कतरा, फफूंदी, काला दाग सरीखे रोगों के कारण इसका उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है। इसके अलावा पान किसानों के बरेजे कभी ओलावृष्टि से तबाह हुए तो कभी प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए, तो कभी अग्निकांड में झुलस गए।
पान किसानों की इस बदहाली को मुद्दा बनाकर खूब राजनीति तो होती है, लेकिन किसानों को उनकी बदहाली से निकालने के लिए फसल की क्षति का मुआवजा नहीं मिलता है। जो पान किसान खेती से जुड़े हैं, वे आर्थिक मदद के लिए शासन-प्रशासन पर ही निर्भर हैं।
ऐसे होती है पान की खेती
पान की खेती के लिए पूरे साल बेल तैयार करके मार्च-अप्रैल से शुरू होकर जून-जुलाई तक पान खाने योग्य हो जाता है। दिन में तीन बार इसकी सिंचाई की जाती है। सिंचाई करने का अंदाज आज भी पुराना है। मटकेनुमा भारी लुटिया में पानी भरकर कंधे के सहारे सिंचाई की जाती है। बुंदेलखंड में पाली के लगभग 450 परिवार पान की खेती पर निर्भर हैं और इसी के सहारे अपने परिवार की गुजर-बसर करते हैं।