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मुद्दे नहीं, अब चुनाव में हावी हो गए जातीय समीकरण

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ललितपुर। विधान सभा चुनाव में जहां विकास के मुद्दे छाए रहते थे, लेकिन अब जातीय समीकरण हावी हो गए हैं। आलम यह है कि जिले में रोजगार के संसाधन न होने से बड़ी संख्या में युवा दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। पत्थर की खदानें बंद होने से सहरिया आदिवासी भी बाहरी जनपदों में चले गए। हैरत की बात तो यह है कि जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कोई उद्योग आदि स्थापित कराने की पहल नहीं की। आज भी जनपद में उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए युवाओं को बाहरी जनपदों में जाना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए निजी कॉलेजों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। कई इलाकों से जिला मुख्यालय तक आने के लिए संसाधनों का अभाव है। अब चुनाव में इन मुद्दों की जगह जातीयता हावी हो गई है। राजनीतिक दल सजातीय मतों को देखकर टिकट का फैसला करते और उसका लाभ भी मिलता आ रहा है। इस बार दो दलों ने एक ही जाति के प्रत्याशी को मैदान में उतारकर चुनाव रोचक बना दिया है।
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विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने जातिगत आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। भाजपा ने सदर क्षेत्र में करीब 68 हजार कुशवाहा मतदाता होने के साथ ही पार्टी के परंपरागत ब्राह्मण, क्षत्रिय,जैन और पिछड़ा वर्ग के वोट को देखते हुए रामरतन कुशवाहा को दोबारा टिकट दे कर चुनाव में उतारा है। वहीं समाजवादी पार्टी ने कुशवाहा के अलावा यादव करीब 53 हजार, मुस्लिम करीब 22 हजार वोट होने के चलते पूर्व विधायक रमेश कुशवाहा को टिकट दिा है। सपा ने करीब 52 लोधी वोटरों को साधने के लिए पार्टी का जिलाध्यक्ष ज्योति सिंह लोधी को बना दिया है। हालांकि कांग्रेस ने लोधी कार्ड खेलते हुए पार्टी के जिलाध्यक्ष बलवंत सिंह राजपूत को टिकट दिया है। प्रत्याशी सजातीय और पार्टी के परंपरागत वोट पर नजर गड़ाए हैं। वहीं बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाते हुए चंद्रभूषण सिंह उर्फ गुड्डू राजा को टिकट दिया है। बसपा प्रत्याशी की पार्टी के परंपरागत वोट के अलावा क्षत्रिय व अन्य समाज के वोटरों पर भी पकड़ मानी जा रही है। चुनाव में जातीय समीकरण कितने हावी हो रहे है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सर्वाधिक कुशवाहा वोटरों को देखते हुए सपा और भाजपा ने कुशवाहा प्रत्याशी ही मैदान में उतारा है। ये तो समय बताएगा कि सजातीय वोट लेने में दोनों प्रत्याशियों में कौन बाजी मारेगा।
चुनाव में शिक्षा, रोजगार, सड़क और पानी के मुद्दे हुए गायब
जनपद में कोई फैक्टरी न होने से युवा रोजगार की समस्या से जूझ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक प्रतिवर्ष करीब 10 हजार युवा गैर प्रांतों में भोपाल, इंदौर, दिल्ली, मुंबई आदि स्थानों पर रोजगार के लिए जा रहे हैं। इधर खदानें बंद होने के बाद कारीगर भी दो जून की रोटी के लिए गैरजनपदों में पलायन करते जा रहे। चुनाव में समस्याओं से जूझ रहे ग्रामीणों के सामने को सड़क बनवाने तक का कोई आश्वासन नहीं दे रहा। हैरत की बात तो यह है कि शहर की करीब 50 हजार की आबादी पेयजल समस्या से जूझ रही लेकिन उस पर भी कोई बोल नहीं रहा। छात्र- छात्राओं को उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए संस्थान चाहिए लेकिन उस पर भी कोई प्लान नहीं है।
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पांच दशक में 70 फीसदी तक पहुंच सका मतदान
सदर विधान सभा क्षेत्र बनने के बाद पहला विधानसभा चुनाव 1974 में हुआ था। उस समय 60.44 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसके बाद 1977 में 45.31 प्रतिशत,1980 में 46.67 प्रतिशत,1985 में 46.08 प्रतिशत,1989 में 56.55 प्रतिशत,1991 में 41.1 प्रतिशत,1993 में 56.75 प्रतिशत,1996 में 49.49 प्रतिशत, 2002 में 65.11 प्रतिशत,2007 में करीब 69 प्रतिशत,2012 में 70.36 प्रतिशत और 2017 में 70.12 प्रतिशत मतदान हुआ।
अनुमानित प्रमुख जातिगत मतदाताओं पर एक नजर
कुशवाहा 68 हजार
यादव 53 हजार
लोधी 52 हजार
रैकवार 25 हजार
साहू 15 हजार
सहरिया 19 हजार
रजक 13 हजार
बंशकार 18 हजार
ब्राह्मण 25 हजार
क्षत्रिय 20 हजार
मुस्लिम 22 हजार
जैन 18 हजार
कुल मतदाता-4,87,641
पुरुष मतदाता-2,55,329
महिला मतदाता-2,32,283
अन्य-29
चुनाव में विकास के मुद्दे खत्म हो गए हैं। अब राजनीतिक दल जाति के आधार पर टिकट देते और प्रत्याशी सजातीय वोट के आधार पर चुनाव लड़कर सदन में पहुंच जाते। यही वजह है कि अब मुद्दों की राजनीति खत्म होती जा रही है जो कि लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।-प्रदीप त्रिपाठी, जिलाध्यक्ष, उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल।
पहले राजनीतिक दलों में विचार आधारित राजनीति होती थी जो अब खत्म होती जा रही है। सभी दल जीतने के लिए जातिगत समीकरण को देख प्रत्याशी उतार रहे हैं। इसका असर विकास पर भी पड़ने लगा है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।- डॉ ओम प्रकाश शास्त्री, संस्कृत विभागाध्यक्ष नेहरू महाविद्यालय।
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