ललितपुर। जिले में अपंग नौनिहालों की फौज तैयार होती जा रही है। तीन वर्षों
में ढाई सैकड़ा से अधिक बच्चे हाथ- पैरों से लाचार हो चुके हैं। चौंकाने
वाली बात यह है कि ज्यादातर बच्चे झोलाझाप डाक्टरों की सुई लगने और दिमागी
बुखार के चलते अपंग हुए हैं। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इन दोनों कारणों
से होने वाली अपंगता का कोई असरदार उपचार भी नहीं है।
विश्व स्वास्थ्य
संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से जिले में पोलियो संभावित एक्यूट फ्लेसिड
पैरालेसिस (एएफपी) मामलों को खोजने के लिए जिले में संचालित एनपीएसपी
प्रोजेक्ट के तहत सर्वेक्षण पर नजर डालें तो वर्ष 2015 में जनवरी से अब तक
46 बच्चे ऐसे मिले, जो किन्हीं कारणों के चलते अपंग हो गए। संभावित पोलियों
की जांच में 39 की रिपोर्ट आ चुकी है, जो कि निगेटिव पाई गई। इसी तरह,
वर्ष 2014 में 97 तथा वर्ष 2013 में 111 अपंग बच्चे चिह्नित करके जांच कराई
गई थी, जिसकी रिपोर्ट में एक भी बच्चे में पोलियो नहीं पाया गया था।
ऐसे
बच्चों को संभावित पोलियो के जांच दल ने पोलियो मुक्त करार देकर आवश्यक
उपचार के लिए स्थानीय चिकित्सालयों में तो भेज दिया, लेकिन जागरूकता के
अभाव में अधिकांश बच्चों के अभिभावकों को यह जानकारी नहीं है कि, यदि उनके
बच्चों को पोलियो नहीं है तो किन कारणों के चलते वे अपंगता का शिकार बन गए।
चौंकाने वाली बात है कि अब तक उजागर हुए अपंगता के मामलों में सबसे ज्यादा
मामलों के पीछे यही दो प्रमुख कारण हैं। जिले में अप्रिशिक्षित डाक्टर गलत
जगहों पर सुई लगाकर नौनिहालों को अपंग बना रहे हैं। बावजूद इसके स्वास्थ्य
विभाग झोलाछाप चिकित्सकों एवं गैर पंजीकृत अस्पतालों पर अंकुश लगाने में
अक्षम प्रतीत हो रहा है।
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दो प्रमुख कारण हैं अपंगता के
स्वास्थ्य
विशेषज्ञों ने इस तरह की अपंगता के लिए चार कारण बताए हैं। पहला कारण-
दिमागी बुखार, दिमागी टीबी अथवा झटके की बीमारी है। दूसरा कारण- जीबीएस
यानि (गुलियनबारे सिंड्रोम), तीसरा- ट्रांसवर्समाईलाइटिस और चौथा एवं अहम
कारण सिएटिक तंत्रिका व रेडिमल तंत्रिका में सुई का लगना है। गुलियनवारे
सिंड्रोम (जीबीएस) के बारे में बताते हैं कि छोटे बच्चों के शरीर में कोई
प्रोटीन उत्पन्न हो जाता है, जिसकी वजह से उनमें अपंगता आती है और
ट्रांसवर्समाईलाइटिस छोटे बच्चों में कमजोरी की बीमारी है।
महत्वपूर्ण बात
यह है नियमित आवश्यक उपचार से इन दोनों कारणों से अपंग बच्चों को शत-
प्रतिशत ठीक किया जा सकता है, लेकिन गलत तरीके से सुई लगने और दिमागी बुखार
से होने वाली अपंगता के मामलों में आसानी से रिकवरी नहीं होती है।
परिवर्तित हुई टीकाकरण पद्घति
ललितपुर।
बांह और कमर में लगने वाली सुई सिएटिक तंत्रिका व रेडियल तंत्रिका में
लगने से बच्चों में अपंगता आने के मामलों से सबक लेते हुए परिवार कल्याण
विभाग ने टीकाकरण पद्घति को परिवर्तित कर दिया है, जिसके तहत अब बच्चों को
कंधे एवं जांघ पर सुई लगाकर वैक्सीन दी जा रही है।
सर्वेक्षण
में मिले अपंग बच्चों की लखनऊ में जांच कराई गई है, जिसकी रिपोर्ट में सभी
पोलियो मुक्त पाए गए हैं। अध्ययन से पता चला है कि चार कारणों से जिले के
बच्चे अपंग हो रहे हैं, जिनका इलाज सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है।
अभिभावकों को जागरुक होकर बीमार बच्चों का त्वरित इलाज कराना चाहिए तथा
अयोग्य डाक्टरों के इंजेक्शन से बचना चाहिए।
- डा. जे एस बख्शी
जिला प्रतिरक्षण अधिकारी, अधिकारी।