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Lalitpur News: बेटी का शव स्कूटी पर ले गए परिजन, तमाशबीन बनी रही भीड़

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संवाद न्यूज एजेंसी
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तालबेहट। हजारिया महादेव मंदिर के समीप मानसरोवर में डूबने से 14 वर्षीय किशोरी छवि की मौत ने सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर ही सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि समाज की मानवीय संवेदनाओं को भी कठघरे में ला दिया। सबसे पीड़ादायक तस्वीर तब सामने आई, जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से बेटी का शव लेकर परिजनों को स्कूटी से घर जाना पड़ा। आसपास लोगों की भीड़ थी, मंदिर क्षेत्र में श्रद्धालुओं की आवाजाही थी, पुलिस बल भी तैनात था लेकिन किसी ने आगे बढ़कर परिवार का दर्द बांटने की पहल नहीं की।
मंगलवार को नगर में दिनभर इस घटना को लेकर चर्चा होती रही। लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी कि एक परिवार को अपनी मृत बेटी का शव दोपहिया वाहन पर रखकर घर ले जाना पड़ा। घटना ने आम लोगों के साथ ही नगर के प्रबुद्ध वर्ग को भी झकझोर दिया है।
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तहसील बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हरिराम श्रीवास ने कहा कि घटना बच्चों की बदलती मनोदशा और परिवार के साथ संवाद की जरूरत की ओर भी ध्यान खींचती है। उन्होंने कहा कि माता-पिता की डांट या किसी बात पर रोक-टोक को बच्चे किस तरह ले रहे हैं, इस पर परिवार और समाज दोनों को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
शिक्षक धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि बच्चों की परवरिश में अनुशासन और संवाद दोनों जरूरी हैं। अभिभावक बच्चों की हर जरूरत पूरी करने के लिए अपना जीवन लगा देते हैं। ऐसे में उनके लिए यह समझना भी जरूरी है कि बच्चों के साथ डांट के बजाय संवाद और विश्वास का रिश्ता कैसे मजबूत किया जाए।

भीड़ और पुलिस की मौजूदगी के बीच उठे सवाल
कारोबारी रामपाल ने कहा कि जिस स्थान पर घटना हुई, वहां आम दिनों में भी लोगों की भीड़ रहती है। सावन के दूसरे सोमवार को तो पूरे क्षेत्र में दिनभर शिवभक्तों की आवाजाही रही। व्यवस्था संभालने के लिए पुलिस बल भी तैनात था। ऐसे में हादसे के बाद क्या तत्काल कदम उठाए गए और परिजनों को किस तरह की सहायता मिली, यह सवाल भी उठ रहा है।
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शव ले जाने की तस्वीर ने झकझोर दिया
घटना का सबसे मार्मिक पहलू वह दृश्य रहा, जब परिजन अपनी बेटी का शव स्कूटी पर लेकर घर की ओर रवाना हुए। जिस बच्ची को कुछ घंटे पहले तक परिवार अपने बीच देख रहा था, उसी का शव इस तरह ले जाने की मजबूरी ने वहां मौजूद लोगों को भी विचलित किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी परिवार पर दुख का पहाड़ टूटने के बाद समाज की पहली जिम्मेदारी उसके साथ खड़े होने की होती है। ऐसे समय में केवल भीड़ का हिस्सा बने रहना मानवीय संवेदनाओं की कसौटी पर सवाल खड़े करता है। परिवार मूल रूप से उरई का रहने वाला है। स्थानीय लोगों का कहना है कि किशोरी के पिता मोमोज का ठेला लगाते हैं।

सुलगते सवाल
- शव ले जाने के लिए परिजनों को वाहन तक क्यों नहीं मिला?
- मौके पर मौजूद लोगों ने मदद के लिए हाथ क्यों नहीं बढ़ाया?
- माैके माैजूद पुलिसकर्मियों ने तत्काल मदद क्यों नहीं की?
- सीएचसी प्रशासन ने घटना पर जवाब देना क्यों उचित नहीं समझा?

कोट
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से शव को घर ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है।
- डॉ. वीरेंद्र सिंह, सीएमओ
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