फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बुंदेलखंड की पुरातात्विक धरोहरों को संरक्षण की दरकार

विज्ञापन
विज्ञापन
ललितपुर। बुंदेलखंड के 13 जिलों के अंतर्गत आने वाले कई ऐसे सैकड़ों पुरातात्विक, एतिहासिक, नैसर्गिक स्थल हैं, जिन्हें पुरातात्विक धरोहरों की श्रेणी में रखा गया है। ये ऐसे स्थल हैं जिन्हें संरक्षण की दरकार है। 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस के बारे में पर्यटन मित्र फिरोज इकबाल डायमंड ने बताया कि इसके मनाने का उद्देश्य धरोहरों के प्रति जागरूकता लाना है। बताया कि इस दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने 1982 में की थी।
विज्ञापन

उन्होंने बताया कि भारतीय स्थापत्य में विभिन्न शैलियों में अलग- अलग विशिष्टताएं होने के बाद भी मूलभूत पक्ष एक समान ही दृष्टिगोचर होते हैं। भारतीय स्थापत्य कला पर भारतीय धर्म, दर्शन, विचारधारा, के साथ-साथ विदेशी शैलियों का भी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय स्थापत्य की वास्तुकला में सिंधु घाटी सभ्यता, मौर्य, शुंग, कुषाण, राष्ट्रकूट, पल्लव, चोल आदि वंशों के शासकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहां की शिल्पकारी में जीवन की सजीवता प्रतिबिंबित होती है। देश के विभिन्न अंचलों में की गई पुरातात्विक खुदाइयों एवं सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य भारत की शान गौरवशाली बुंदेली क्षेत्र की सीमाओं में विभिन्न राजाओं के कार्यकाल में परिवर्तन आया पर सांस्कृतिक भौगोलिक ईकाई के रूप में ललितपुर, झांसी, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, चित्रकूट, दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सागर, दमोह को बुंदेलखंड परिक्षेत्र से जाना गया। बुंदेलखंड का भौगोलिक दृष्टि से नदियों और पर्वतों के आधार पर सीमांकन किया गया है। यहां की शिल्पकारी को समेटे धरोहरें भारतीय इतिहास में अनूठी पहचान रखती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें