ललितपुर। अक्षय तृतीया पर्व को न केवल हिंदू, बल्कि जैन समाज के लोग भी धार्मिक उत्सव के रूप में मनाते हैं। हिंदू धर्मावलंबी जहां भगवान परशुराम को याद करते हैं, वहीं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ ने सत्य और अहिंसा का प्रचार करने और अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार से वैराग्य प्राप्त किया था। अक्षय तृतीया आज रविवार को घरों में मनाई जाएगी।
प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ सत्य और अहिंसा का प्रचार करते-करते हस्तिनापुर पहुंचे, जहां इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर संपूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा। सोमप्रभु के पुत्र श्रेयांस ने प्रभु को देखकर आदिनाथ को पहचान लिया और शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया। जिससे, आदिनाथ ने व्रत की पारणा की। शिक्षक पुष्पेंद्र जैन के अनुसार जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं। इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया। भगवान आदिनाथ ने लगभग चार सौ दिन की तपस्या के पश्चात पारणा की थी। इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना करके स्वयं को धन्य मानते हैं। यह तपस्या प्रति वर्ष वैशाख मास के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारणा कर पूर्ण की जाती है। तप आरंभ करने से पूर्व इस बात का पूर्ण ध्यान रखा जाता है कि चौदस को उपवास करना होता है। उपवास में केवल गर्म पानी का सेवन किया जाता है।
यह तपस्या धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व है। मन, वचन एवं श्रद्धा से वर्षीतप करने वाले को महान समझा जाता है। हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं।