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कैवेखों अन्नदाता हैं भैया, किसानन की कउ सुनाई नइया

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कैवेखों अन्नदाता हैं भैया, किसानन की नइयां कऊं सुनाई
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ललितपुर। लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में उतरे उम्मीदवार शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र के लोग पान की दुकान के पास बैठकर सियासी चर्चा कर रहे हैं। ऐसा ही नजारा घंटाघर स्थित पान की दुकान का रहा।
ग्राम पड़ोरिया निवासी कड़ोरेलाल कहते हैं कि किसानन को तौ मरवो है। एक तो सरकारन से कोनऊ खास सुविधा नहीं मिल पा रइ, जीसें फसल की लागतई निकर आवे। ई मैंगाई के समय में खेती घाटे कौ सौदा हो गई। कतते कि किसान की आय दुगनी होवे बारी है, लेकिन कायखों किसान पैले जिते खड़ो तो उतईं आज भी ठाड़ों हैं। कैवे खों किसान धरती पुत्र, अन्नदाता हैं।
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ग्राम पड़ोरिया निवासी दशरथ सिंह कहते हैं कि ऐसो कई बार हो गओ कि जब फसल अच्छी हुइये, तबईं इंद्र देवता नाराज हो जात। कल तो ऐसो भओ कै जैसे किसानन के सीना पर दार दरी होए। जैसई भुंसारो भओ, वैसइ आसमान से बरफ के पथरा गिरन लगे। देखत-देखत तो धरती सफेद हो गई। जो कछु कसर बची थी सो खेतन में पानी भरवें से पूरी हो गई। भगवान जानत हुइये कि किसानन ने कैसे फसल तैयार करी थी। रात दिन एक करकें फसल घर में पौंचवे की बारी आ गई थी, लेकिन भगवान खों मंजूर नहीं हुइये सो जो हो गओ। ग्राम करगन निवासी कृष्णपाल यादव कहते हैं कि अबे चुनाव चल रहे, जीसें कोनऊ नेता खेतन में ढूंकबे नहीं गओ कि फसल बची, कै नइं। प्रशासन खों भी कां फुर्सत हैं। अधिकारियन ने किसानों के गुस्सा पर पानी डारकें घरे भगा दओ। जिनकी फसलें बर्बाद हो गईं, उनके दिल सें पूछो कि उनके ह्दय पे का गुजर रई हुइये। मोहल्ला आजादपुरा निवासी कैलाश कहते हैं कि जिनकी फसलें कटी डरीती और उनकी थ्रेसर होनी हती, सबसे जादा उने पश्चापो हो रओ। वे कत फिर रये, कै एक दिन और मिल जातो तो हम थ्रेसर कराके फसल घरे रख लेते। सरकार ने बीमा देवे की योजनाएं तो बनाईं, लेकिन कंपनियन बारे इतने आसानी से किसानन खों क्लेम नईं देत। सौ चक्कर कटवा लें, तब जाके आधा अधूरो क्लेम मिलपे। भैया, पिछले खरीफ को कई गांवन के किसानन को बीमा नईं मिल पाऔ, वे आज तक चक्कर लगा रये।
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ग्राम बरौदी निवासी मेहरबान कहते हैं कि सरकारें किसानन के लाजें योजनाएं तो भौत बनाउत, लेकिन ऊको लाभ कां मिल पाउत। बेइ किसान ऊको लाभ उठा पात जो दलाल से सेंटिंग कर लेत। जीने सीधे लाभ पावे की कोशिश करी, उनकी चप्पलें घिस जातीं। कई तो थक कैं घरै बैठ जात। सरकारन को ऐसी कोनऊ योजना बनाने आए, जीसें किसानन खों घर बैठे लाभ मिल जाए। इसी दौरान कई और किसान आ जाते हैं, जिससे चर्चा का क्रम टूट जाता है।
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