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-17 साल का वनवास खत्म करने को उतरी भाजपा

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17 साल का वनवास खत्म करना चाहती भाजपा
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ललितपुर।
भारतीय जनता पार्टी के लिए नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद का चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। जिस समय भाजपा नगर पालिका में काबिज हुई थी, उस दौरान प्रदेश में पार्टी सत्तारूढ़ थी। अब एक फिर चुनाव प्रदेश में सरकार रहते हुए हो रहे हैं, इस दौरान पार्टी सत्रह साल का वनवास खत्म करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रही है। भाजपा इससे पहले के तीन चुनाव हार चुकी है, जिससे उम्मीदवार को अपने पक्ष में माहौल बनाने में कठिनाई आ रही है।
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वर्ष 1995 वें में भारतीय जनता पार्टी ने नगर पालिका परिषद में काबिज होने के लिए जातिगत समीकरण बैठाए थे। उस दौरान टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे व्यापारी नेता कैलाश ड्योडिया की अनदेखी कर नीलम सिंह वर्मा को उम्मीदवार बनाया था। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर कैलाश ड्योडिया ने पर्चा भर पार्टी की परेशानी बढ़ा थी। उस समय भाजपा की ओर से नीलम सिंह वर्मा नया चेहरा थे, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं को ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। हालांकि, उस समय का एक गोलीकांड पार्टी के लिए संजीवनी साबित हुआ। इस दौरान एक चिकित्सक की लापरवाही से दुर्घटनाग्रस्त एक छात्र की मौत हो गई थी। इसका छात्रों ने सड़कों पर विरोध शुरू कर दिया था। सावरकर चौक पर किसी व्यक्ति ने मौके पर मौजूद उस समय के एसडीएम पर पत्थर फेंक दिया था, जिसमें वह चुटहिल हो गए थे। इस पर पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया था। जिससे छात्र और उग्र हो गए। मजबूरन, पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें लखेरा समाज के एक युवक की मौत हो गई थी। इस तनाव के चलते नगर निकाय के चुनाव को बीच में रोक दिया गया था। इस बीच भाजपा के नेता सांसद राजेंद्र अग्निहोत्री व अरविंद जैन ने भाजपा उम्मीदवार के कमजोर पक्ष को मजबूती प्रदान की, जिसमें निर्दलीय उम्मीदवार कैलाश ड्योडिया को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें करीब 07 हजार वोट से संतोष करना पड़ा तो भाजपा उम्मीदवार नीलम सिंह वर्मा 11 हजार 800 मत लेकर विजयी घोषित किए गए। अगले चुनाव में पालिकाध्यक्ष नीलम सिंह वर्मा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरे तो भाजपा ने प्रदीप चौबे को अपना उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के नेता डा. सतीश सुड़ेले ने करीब 12 हजार 500 मत प्राप्त किए तो भाजपा के उम्मीदवार प्रदीप चौबे करीब नौ हजार मत लेकर दूसरे स्थान पर रहे। इस दौरान निर्दलीय उम्मीदवर नीलम सिंह वर्मा अपने समाज का भी वोट हासिल नहीं कर सके। वर्ष 2006 में भाजपा ने प्रदीप चौबे पर दोबारा दांव खेलते हुए उन्हें टिकट दिया। इस चुनाव में सपा ने गुलाम मुहम्मद गामा, कांग्रेस ने दिनेश किलेदार, बसपा ने रमेश कुशवाहा व निर्दलीय के तौर पर रमेश खटीक चुनाव लड़े। इस चुनाव में दो ब्राह्मण उम्मीदवार होने से प्रदीप चौबे प्रचार की हवा नहीं बना सके। जिसमें भाजपा उम्मीदवार की हार हुई। चुनाव में प्रदीप चौबे को करीब दस हजार सात सौ वोट प्राप्त हुए जबकि विजयी उम्मीदवार रमेश खटीक को बारह हजार से अधिक मत प्राप्त हुए। चुनाव में रमेश खटीक को दानवीर छवि का लाभ मिला। अगला चुनाव पिछड़ी सीट होने से पालिकाध्यक्ष रमेश खटीक चुनाव नहीं लड़ सके। हालांकि, कार्यकाल पूरा होने तक उनकी छवि बेहद खराब हो गई थी। वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा ने घनश् याम साहू, सपा ने राजेश यादव, कांग्रेस ने दुर्गा प्रसाद कुशवाहा, बसपा ने अतीक अहमद को उम्मीदवार बनाया था। चुनाव में सुभाष जायसवाल को धार्मिक एवं धनाढ्य होने का फायदा मिला। मतदाताओं का मानना था कि पैसे होने के कारण पालिका में भ्रष्टाचार नहीं होगा। इस छवि की बदौलत उन्हें 24 हजार 840 वोट मिले तो दूसरे नंबर पर भाजपा के घनश्याम साहू को करीब नौ हजार मत ही मिल सके। वर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा की ओर से घनश्याम साहू की पत्नि रजनी साहू, कांग्रेस से यशोधरा राजे, बसपा से आशा जड़िया, सपा से संध्या सुड़ेलेे मैदान में हैं। यह चुनाव भी भाजपा के लिए आसान नजर नहीं आ रहा है। पार्टी के दो बागी उम्मीदवार पूर्व विधायक की पत्नि क मला देवी व नरेंद्र कड़की की पत्नि वंदना जैन चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा भाजपा का परंपरागत वोट जिसमें ब्राह्मण, जैन, सोनी, सिंधी, कुशवाहा, ठाकुर स्वजातीय उम्मीदवारों के बीच उलझकर रह गया है। ऐसे में भाजपा को ऐडीचोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। पार्टी यह चुनाव जीत पाती है या नहीं, यह तो अगले माह की पता चल सकेगा। लेकिन, पार्टी नेताओं के चेहरे पर अभी से तनाव दिखाई देने लगा है।
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