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धन की कमी से जूझ रहे मनरेगा, श्रमिकों के फंसे करोड़ों

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धन की कमी से जूझ रहे मनरेगा, श्रमिकों के फंसे करोड़ों
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ललितपुर। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना धन की कमी से जूझ रही है। विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो इस समय जिले के सैकड़ों श्रमिकों का एक करोड़ पंद्रह लाख रुपये फंसा है। यदि इसमें सामग्री के भुगतान को जोड़ लिया जाए तो कुल मिलाकर छह करोड़ 48 लाख रुपये का बकाया बना हुआ है। इस स्थिति में श्रमिक मनरेगा का कार्य करने से कतराने लगे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर 100 दिन की गारंटी का रोजगार मुहैया कराने के लिए मनरेगा संचालित की जा रही है। इस योजना में जिले के एक लाख से ज्यादा परिवार पंजीकृत हैं। सूखे के समय योजना श्रमिकों के लिए वरदान बन जाती है पर मौजूदा समय में मनरेगा की स्थिति ठीक नहीं है। योजनांतर्गत विभिन्न ब्लाकों में काम कर रहे श्रमिकों को भुगतान के लिए महीनों चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। तमाम मजदूरों के घर का बजट गड़बड़ा गया है। इससे ये हुआ कि जो श्रमिक कल तक मनरेगा का काम करने में दिलचस्पी दिखाते थे, अब वह योजना से दूर खड़े दिखाई दे रहे हैं। वर्तमान में श्रमिकों की मजदूरी का एक करोड़ 15 लाख रुपये, सामग्री का चार करोड़ 25 लाख रुपये बकाया है। कुल मिलाकर जिले का छह करोड़ अड़तालीस लाख बावन हजार रुपये अटका हुआ है। इस संबंध में विभागीय अफसरों की ओर से पत्राचार किया गया है लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो सका है।
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छला सा महसूस कर रहे श्रमिक
ग्रामीण स्तर पर श्रमिकों से कार्य लिया गया है लेकिन उनके भुगतान की समस्या दूर नहीं हो पा रही है। ऐसे में श्रमिक खुद को छला सा महसूस कर रहे हैं। वहीं, विभागीय अफसर मौजूदा वित्तीय वर्ष का लक्ष्य एक सौ छह प्रतिशत हासिल कर गदगद नजर आ रहे हैं। विभाग को 32 लाख 18 हजार लक्ष्य मिला था, जिसके सापेक्ष 34 लाख 20 हजार मानव दिवस का रोजगार श्रमिकों को दिया गया है।

किया जा रहा पत्राचार
लखनऊ स्तर से ही धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। श्रमिकों का भुगतान कराने के लिए पत्राचार किया जा रहा है। उन्होंने शीघ्र ही भुगतान होने की उम्मीद जताई।
इंद्रमणि त्रिपाठी, उपायुक्त श्रम रोजगार
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