देश की संप्रभुता को चुनौती देते हुए विदेशी आकाओं के इशारे पर मुंबई में किए गए कत्ल-ए-आम का आरोपी याकूब मेनन आखिर अपने अंजाम तक पहुंच ही गया। गुरुवार को फांसी दिए जाने की खबर आई तो हर तरफ इसे उचित करार दिया गया। उधर, कानून के जानकारों ने इसे अच्छा फैसला बताया। इस मामले में सिविल कोर्ट में फौजदारी से जुड़े अधिवक्ताओं ने भी प्रतिक्रिया दी।
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समाज के लिए जरूरी
बढ़ रही अराजक स्थितियों और कानून व्यवस्था के नियंत्रण के लिए जरूरी है कि जघन्यतम अपराध के बदले कठोरतम दंड दिया जाए, इससे समाज में अच्छा संदेश जाता है।
-जाहिद अली खां
एडवोकेट सिविल कोर्ट खीरी
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अपराधियों के लिए सीख है फैसला
कानून व्यवस्था का माखौल उड़ाने और दरिंदगी करने वालों के प्रति उदार रवैया की अपेक्षा नहीं की जा सकती यह सुखद है कि अदालतों ने भी समाज के प्रति दरिंगदी की वेदना को महसूस करते हुए सटीक फैसला सुनाया है। इससे अपराधियों को सीख मिलेगी।
-कौशल किशोर
एडीजीसी, फौजदारी
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अमन और शांति के लिए जरूरी हैं बड़े फैसले
भारतीय दंड व्यवस्था वैसे तो सुधारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है लेकिन बड़े दुर्दांत ढंग से मानवीयता के प्रति किए गए सामूहिक हत्याओं जैसे संगीन अपराध को समाज के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है लिहाजा सिस्टम ने ऐसे वायरस को हटाने के लिए ही फांसी जैसे कठोर दंड की व्यवस्था की है। विदेशी ताकतों के इशारे पर मुंबई में किए गए कत्लेआम में फांसी से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि अमन और शांति कायम रखने के लिए भी कभी-कभी बड़े फैसले जरूरी होते हैं।
-शैलेंद्र सिंह गौड़
पूर्व एडीजीसी और फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता सिविल कोर्ट खीरी