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तंत्र-मंत्र के लिए वन्यजीवों की तस्करी रोकना बड़ी चुनौती बड़ी चुनौती

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कार्यशाला के दौरान वन्यजीव अपराध रोकने के लिए की गई मॉक ड्रिल। - फोटो : LAKHIMPUR
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बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। वन्यजीव अपराध नियंत्रण को लेकर टाइगर रिजर्व में चल रही चार दिवसीय कार्यशाला के अंतिम दिन गुरुवार को डब्ल्यूटीआई के विशेषज्ञों ने वन्यजीव अपराधों की बदलती प्रवृति के बारे में जानकारी देते हुए ऐसे अपराधों से निपटने के तरीके भी बताए। कार्यशाला में फील्ड स्टाफ को जानकारी दी गई कि अपराध शैली में बदलाव के चलते इनका अनुसंधान करना काफी चुनौती पूर्ण हो गया है।
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डब्ल्यूटीआई की ओर से हुई कार्यशाला में वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के प्रोजेक्ट हेड/एडवाइजर प्रेम चंद्र पांडेय बताया कि बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा आदि वन्यजीवों के अंगों की तस्करी के साथ-साथ अब नेवला, कछुआ, सांप, उल्लू आदि जीवों की तंत्र-मंत्र के लिए तस्करी हो रही है। यह अंधविश्वास की जड़ें भारत के अलावा चीन, म्यंमार, जापान, भूटान, सिंगापुर आदि देशों में गहराई तक फैली हैं। इन देशों में इन वन्यजीवों की काफी मांग रहती है। उन्होंने बताया कि दिवाली के सीजन में उल्लू की मांग काफी बढ़ जाती है। ऐसे में यदि सतर्कता न बरती जाए तो इस प्रजाति के अस्तित्व पर ही संकट पैदा हो सकता है। चीन में कछुए को पवित्र मानते हैं तो कुछ देशों में इसका मांस खाया जाता है। इसी तरह अंधविश्वास के चलते सांपों और नेवलों का भी तंत्र-मंत्र में इस्तेमाल होता है।
उन्होंने बताया कि बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा आदि का शिकार होने पर इसकी गूंज देश भर में हो जाती है, जबकि उल्लू, कछुआ, सांप, नेवला आदि वन्यजीवों का शिकार होने पर फील्ड में तैनात कर्मचारियों को पता लगाना मुश्किल पड़ जाता है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता के लिए जितने जरूरी बाघ और अन्य वन्यजीव हैं उतने ही महत्वपूर्ण यह छोटे वन्यजीव। इन वन्यजीवों का शिकार और तस्करी कैसे रोकी जाए इसके भी मंत्र दिए गए। कार्यशाला में दुधवा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों और फील्ड स्टाफ के अलावा डब्ल्यूटीआई के विशेषज्ञ मौजूद रहे। कार्यशाला का समापन डीडी दुधवा मनोज सोनकर ने किया। संवाद
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