लखीमपुर खीरी। कोरोनाकाल में लोग कई माह से लंबी दूरी के लिए सैर-सपाटे को नहीं निकल पा रहे हैं। ऐसे में उनके लिए जनपद के ही विभिन्न हिस्सों में पर्यटन के कई प्रसिद्ध स्थान मौजूद हैं। 7680 वर्ग किमी भू-भाग में आस्था, इतिहास और पर्यावरण को अपने आंचल में समेटे गेटवे आफ तराई (तराई का प्रवेश द्वार) के कई स्थानों पर भ्रमण करके सीधे आस्था और पर्यावरण से जुड़ा जा सकता हैं। ऐसे में पर्यटन के लिहाज से भी अपार संभावनाएं बढ़ेंगी, जिससे लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अपने भ्रमण के दौरान कई बार दुधवा नेशनल पार्क समेत अन्य प्रसिद्ध स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के निर्देश देते रहे हैं। इसके लिए लखीमपुर से दुधवा तक स्टेट हाईवे का चौड़ीकरण का कार्य भी कराया जा रहा है।
छोटी काशी में शिवधाम के करें दर्शन
गोला गोकर्णनाथ में छोटी काशी के नाम से सुविख्यात शिव मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है, जहां पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। यहां चैत्र मास में चैती मेला लगता है और सावन भर श्रद्धालु यहां आकर शिव आराधना करते हैं। मंदिर में स्थापित शिवलिंग को लंका का राजा रावण कैलाश से लंका ले जा रहा था, कहा जाता है कि तब रास्ते में वह इसी जगह विश्राम के लिए रुका था। लघुशंका के कारण रावण ने चरवाहे को शिवलिंग हाथ में दिया था, जिसके बाद चरवाहे ने भार अधिक होने के कारण शिवलिंग को वहीं जमीन पर रख दिया था। इसके बाद रावण शिवलिंग को उठा नहीं पाया था, जिससे क्रोधित होकर रावण ने शिवलिंग को अंगूठे से दबा दिया था। रावण के अंगूठे का निशान आज भी देखा जा सकता है। मंदिर परिसर के तीर्थ में स्थापित भगवान शिव की विशाल मूर्ति भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है। लखीमपुर-शाहजहांपुर मार्ग पर स्थित छोटी काशी तक पहुंचने के लिए लखीमपुर से 35 किमी दूरी तय करनी होगी, जिसके लिए बस और ट्रेन सेवा आसानी से उपलब्ध है।
महाभारत कालीन स्मृतियों को समेटे है देवकाली मंदिर
जनपद मुख्यालय से करीब सात किमी दूर देवकाली शिव मंदिर है। भगवतगीता के अनुसार राजा परीक्षित ने अपने बेटे को सर्पदंश से बचाने के लिए नाग यज्ञ कराया था। इससे सभी सांप यज्ञ मंत्र की शक्ति से हवनकुंड में कूद पड़े थे। इस यज्ञ के बाद इस क्षेत्र में कभी कोई सांप नहीं पाया गया। मान्यता यह भी है कि भगवान ब्रह्मा की पुत्री देवकाली ने इस स्थान पर कड़ी तपस्या की थी, जिससे शिव मंदिर का नाम देवकाली के नाम पर रखा गया है। पर्यटकों को यहां पहुंचने के लिए सड़क और रेल मार्ग सुलभ है।
दुधवा नेशनल पार्क में वन्य जीवों का करें दीदार, प्रकृति से करें साक्षात्कार
भारत-नेपाल सीमा पर स्थित दुधवा नेशनल पार्क उत्तर प्रदेश का एकलौता पार्क है, जिसमें बाघ, गैंडा, हाथी, बारहसिंगा, चीतल, सांभर आदि वन्य जीव स्वच्छंद विचरण करते हैैं। तो वहीं पक्षियों में बंगाल फ्लोरिकन, पैंटेड स्टार्क, ब्लैक नेक्ड स्टार्क, फ्लाइंग स्कैवरल के अलावा सरीसृप, उभयचर, मछलियों, आर्थोपोड्स की लाखों प्रजातियां हैं। पार्क केे आसपास थारू जनजाति के कई गांव होने से यहां थारू संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है। चंदनचौकी में तो थारू हस्तशिल्प ग्राम की स्थापना की गई है, जिसमें पर्यटकों के लिए कई सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसके अलावा दुधवा नेशनल पार्क समेत आसपास के क्षेत्रों में पर्यटकों के ठहरने के लिए थारू हट भी बनाए गए हैं। दुधवा पार्क में घूमने के लिए ऑनलाइन बुकिंग करानी पड़ती है। दुधवा पहुंचने के लिए पर्यटकों के लिए सड़क मार्ग सबसे मुफीद है, क्योंकि यहां पहुंचने के लिए रेल यातायात की सुविधा अभी नहीं है। लखीमपुर, लखनऊ और दिल्ली से सीधे पलिया के लिए बस सेवा उपलब्ध है, जहां से 10 किमी दूरी तय करके दुधवा नेशनल पार्क पहुंचा जा सकता है।
ओयल में मांडूक तंत्र पर आधारित मेढ़क मंदिर
लखीमपुर से सीतापुर मार्ग पर स्थित मुख्यालय से 12 किमी दूर ओयल नगर का प्राचीन मेढ़क मंदिर काफी प्रसिद्ध है। इसका निर्माण 1870 में करवाया गया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि मांडूक तंत्र पर आधारित यह मंदिर मेढ़क के आकार में बना हुआ है। मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं, जिसका प्रमुख द्वार पूर्व दिशा की ओर और दूसरा मार्ग दक्षिण दिशा की ओर खुलता है। मंदिर के ऊपर स्वर्ण निर्मित छत्र में भगवान नटराज की नृत्य करती मूर्ति चक्र के अंदर स्थापित है, जो सूर्य की दिशा के अनुसार घूमती रहती हैै। यहां पर पहुंचने के लिए बस और ट्रेन की सुविधा आसानी से उपलब्ध है।
रमणीक स्थान पर स्थित है लिलौटीनाथ मंदिर
लखीमपुर से नौ किमी दूर शारदानगर मार्ग पर स्थित लिलौटीनाथ मंदिर भी महाभारत कालीन यादों को संजोए है। मान्यता है कि इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने की थी। राजा महेवा ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। मंदिर में स्थित शिवलिंग अद्भुुत है, क्योंकि प्रतिदिन शिवलिंग के कई बार रंग बदलते हैं। खास बात यह है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन मंदिर का द्वार खुलने से पहले भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर जाते हैं। प्रत्येक वर्ष सावन में प्रत्येक दिन और हर महीने में अमावस्या को यहां मेला लगता है।
सिंगाही में देखे भूल-भुलैया
पवित्र सरयू नदी के किनारे स्थित सिंगाही कस्बे में भूलभुलैया के नाम से प्रसिद्ध शिल्पकला की बेजोड़ कलाकृति देखने को मिलेगी। वास्तविकता में यह भी शिवमंदिर है। तत्कालीन खैरीगढ़ स्टेट के राजा इंद्र विक्रम शाह ने करीब 150 साल पहले विशाल मंदिर का निर्माण करवाकर उसमें भगवान इंद्रेश्वर महादेव की स्थापना की थी। इसकी सिंगाही के राजमहल से करीब डेढ़ किमी दूरी है। करीब तीन मीटर ऊंचे प्लेटफार्म के मध्य में स्थित अष्टकोणीय मंदिर के चारों ओर सीढ़ियां बनी हैं। इन सीढ़ियों के बीच में चारों ओर दरवाजे हैं, जो भूमिगत भूलभूलैया के प्रवेश द्वार हैं। इस भूलभुलैया से सिंगाही स्थित राजमहल समेत अन्य हिस्सों में जाने के लिए सुरंगे थीं, जिन्हें बंद करा दिया गया है। इसके अलावा खैरीगढ़ के पास जंगल में किला गौरी शाह और काली माता मंदिर भी ऐतिहासिक स्थल हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क यातायात ही उपलब्ध है, जिससे प्राइवेट और रोडवेज बस से भूलभुलैया तक पहुंचा जा सकता है।
दिल्ली से लखीमपुर की दूरी 356 किमी
लखनऊ से लखीमपुर की दूरी 124 किमी
जिला योजना में बजट का प्रस्ताव कर भूल जाते हैं अफसर
पर्यटन स्थलों को विकसित करने के लिए 160 लाख रुपये के बजट को मिल चुका अनुमोदन
लखीमपुर खीरी। पर्यटन के विकास को लेकर हर बार जिला योजना में बजट का प्रस्ताव शामिल किया जाता है, लेकिन बजट का एक धेला भी पर्यटन के विकास पर खर्च नहीं किया जा रहा है। वर्ष 2019-20 में पर्यटन के लिए 200 लाख रुपये के बजट का अनुमोदन हुआ था, लेकिन साल बीतने को है अब तक एक धेला खर्च नहीं किया गया। इसके बावजूद वर्ष 2020-21 की जिला योजना में पर्यटन स्थलों के विकास और सौंदर्यीकरण कराने के लिए 160 लाख रुपये के प्रस्ताव शामिल किए गए हैं। कार्ययोजना में यह नहीं बताया गया है कि किस पर्यटन स्थल पर कार्य कराए जाएंगे, जिससे प्रतीत होता है कि इस बार भी पर्यटन को लेकर बजट प्रस्ताव में सिर्फ औपचारिकता निभाई गई है।
जनपद में इंडो-नेपाल बार्डर की लंबी सीमा होने के साथ ही प्रदेश का एकलौता दुधवा नेशनल पार्क भी है। कई नदियों से घिरे होने के अलावा जनपद में कई प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्थल भी हैं। इससे पर्यटन के क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। इनके विकास को लेकर लंबे समय से मांग की जाती रही है, लेकिन आज तक शासन-प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया है और न ही जनप्रतिनिधियों ने कभी संजीदगी दिखाई है। पर्यटन के विकास को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी बर्ड फेस्टिवल में आश्वासन दे चुके हैं। फिर भी हालात जस के तस बने हुए हैैं। खास बात यह है कि पर्यटन विभाग ने अब तक यहां अपना दफ्तर तक नहीं खोला है और न ही किसी अधिकारी की यहां तैनाती हुई है। सिर्फ जनपद का चार्ज एक क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी को दिया गया है, जो जिला प्रशासन की बैठकों में भी शामिल नहीं होते हैैं। लिहाजा पर्यटन के मुद्दे पर बात होती भी है, तो अधिकारी के न होने से उस पर चर्चा नहीं हो पाती।
विधायकों को मिलेंगे 50-50 लाख
जिला योजना से भले ही पर्यटन के विकास को लेकर कोई काम नहीं हुए, लेकिन प्रदेश सरकार द्वारा लाई गई मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना से जरूर उम्मीद की किरण नजर आई है। इस योजना से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र पर्यटन केंद्रों को विकसित करने के लिए विधायकों को 50-50 लाख रुपये बजट मिलेगा। इससे चिह्नित पसंदीदा पर्यटन स्थलों को विकसित करके यात्रियों के लिए मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। सरकार की मंशा है कि इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष निवेश को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इसके लिए डीएम की अध्यक्षता में समिति बनाई जाएगी। इस बात की जानकारी क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी अनुपम श्रीवास्तव ने दी।
लिलौटी नाथ मंदिर। - फोटो : LAKHIMPUR
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान। - फोटो : LAKHIMPUR
सिंगाही की भुलभुलैया। - फोटो : LAKHIMPUR
ओयल का मेंढक मंदिर। संवाद- फोटो : LAKHIMPUR