मां-बाप का दुलार नहीं पर इस घर में ‘ममता’ की कमी नहीं
अपनों को खो चुके 16 मासूमों की सबकुछ हैं रीता और रामवती
पढ़ा लिखाकर आगे बढ़ाने की भी दे रहीं प्रेरणा
जन्म देने वाली मां से ज्यादा उस मां का महत्व होता है, जो पालन पोषण कर बच्चे को योग्य बनाती है। कुछ ऐसा ही साबित करने में लगी हैं बाल गृह में काम करने वाली ये ‘यशोदा माएं’ रीता सक्सेना और रामवती राना। वह वर्तमान में 16 बच्चों का लालन-पालन ही नहीं, बल्कि पढ़ा लिखाकर योग्य बना रही हैं। इनमें से कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिन्हें अपनी जन्म देने वाली मां का चेहरा तक याद नहीं। उनके लिए मां के साथ पूरा परिवार भी यही हैं।
बाल कल्याण समिति के आदेश पर मां काली सेवा संस्थान द्वारा संचालित बाल गृह (बालक) में 16 बच्चे हैं, जिनका अपना कोई नहीं है। इनमें से कुछ के मां-बाप इस दुनिया में नहीं रहे तो कुछ अपनों के उत्पीड़न से परेशान होकर भाग आए या फिर बंधुआ बाल मजदूरी करते पकड़े गए। इन मासूमों का कोई अपना नहीं मिला तो बाल कल्याण समिति ने बाल गृह में इन्हें लालन पालन के लिए भेज दिया। संस्थान के राष्ट्रीय समन्वयक संजय सिंह ने बताया कि बाल गृह में आने पर हर बच्चा डरा और सहमा होता है। उसके चेहरे में मुस्कान नहीं होती, लेकिन यहां इन्हें रीता सक्सेना और रामवती राना का सहारा मिलता है तो कुछ घंटों में ही वह खिलखिलाकर हंसने लगते हैं। वह बताते हैं कि इन बच्चों को शायद इस दुनिया में कोई नहीं है, लेकिन रीता और रामवती इनका सबकुछ बन चुकी हैं। वह इन्हें सुबह जगाती भी हैं और रात थपकी देकर सुलाने के बाद ही अपने बिस्तर पर जाती हैं। वह बताते हैं कि बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उनकी पढ़ाई का भी ध्यान रखा जा रहा है।
हर बच्चे की है झकझोर देने वाली कहानी
वैसे तो बाल गृह में रहने वाले हर मासूम की कहानी बेहद झकझोर देने वाली है। बानगी के तौर पर 15 साल के राजू को सिर्फ इतना पता है कि उसे काम पर लगा दिया गया था। वह जब दस साल का था तब एक फार्मर के यहां झाड़ू लगाने से लेकर खेत पर काम करता था। तभी एक शिकायत पर उसे वहां से बरामद किया गया। फार्मर ने जिसे उसका पिता बताया, वह जांच में सही नहीं पाया गया तो बाल गृह में दे दिया गया। अब 18 साल तक वह यहां रहकर पढ़ाई करेगा और बालिग होने के बाद अपनी मंजिल तय कर सकेगा। इसी तरह 14 साल के गिरजाशंकर, 11 साल के शिवशंकर, 12 साल के शिवा के मां-बाप नहीं हैं। निराश्रित होने के कारण बालिग होने तक यहां रहेंगे। इसके अलावा 17 वर्षीय अजब, 11 वर्षीय रग्घू, विकास, शिवम, आदर्श, गणेश, मोहन, चित्रांशु, रवि, मुकेश और 13 वर्षीय राहुल को अपने मां-बाप और गांव तक का पता नहीं है। आकाश मनोरोगी है, इसलिए कुछ भी बता नहीं पा रहा है। इन सभी बच्चों को बालिग होने तक संस्था में रखा जाएगा।
गुदड़ी के लाल : मुकेश और राजू रहे अव्वल
न कभी मां-बाप का दुलार मिला और न ही अपना घर, लेकिन बाल गृह में रहकर और सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने के बाद भी अपनी प्रतिभा का लोहा मुकेश और राजू ने मनवा दिया है। प्राथमिक विद्यालय सदर में कक्षा तीन के छात्र मुकेश और उच्च प्राथमिक विद्यालय सदर में कक्षा छह की परीक्षा देने वाले राजू ने प्रथम स्थान पाकर अपने मेधावी होने का प्रमाण हासिल कर दिखाया है। संस्था में दोनों बच्चों को खूब पढ़ाने का मन बनाया है। उनकी सफलता पर संस्थान में मिठाई बांटी गई और बच्चों का उत्साहवर्धन किया गया।
इन बच्चों की सेवा कर मिलती है खुशी
संस्थान की केश वर्कर रीता सक्सेना और प्रभारी अधीक्षक रामवती राना कहती हैं कि उन्हें अपने घर से ज्यादा इन बच्चों के बीच रहने में खुशी मिलती है। वह इन बच्चों को सिर्फ खुश देखना चाहती है और उन्हें कुछ बनाना चाहती हैं। वह सुबह जल्दी ही आ जाती हैं और देर रात घर जाती हैं। बच्चे जब हंसते हैं तो उन्हें बेहद खुशी मिलती है।
मेधावी बच्चों को खूब पढ़ाएंगे
संस्थान के राष्ट्रीय समन्वय संजय सिंह का कहना है कि मुकेश और राजू ने बाल गृह का नाम रोशन किया है। उन्हें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने के लिए वह प्रयासरत हैं। समिति के साथ उच्चाधिकारियों से भी सहयोग लेकर दोनों को निजी विद्यालय में प्रवेश दिलाने की हर संभव कोशिश की जाएगी। वह कहते हैं कि उनका सपना है कि उनके यहां से बच्चा जब बालिग हो तो उपने पैरों पर खड़ा होकर अपना घर बसाए।